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“नमस्ते, इंडिया! नमस्ते...” - विक्टर अस्ताफ़येव

Monday, 23 July 2012 13:44

विक्टर अस्ताफ़येव

प्रिय श्रोताओ, आज हम आपको लेखक विक्टर अस्ताफ़येव की कहानी ‘इण्डिया’ सुनाना चाहते हैं| तो आइये, पहले स्वयं लेखक का छोटा सा परिचय दे दें|जीवन का निर्मम सच्चाई के साथ चित्रण करके अस्ताफ़येव ने बीसवीं सदी के दूसरे भाग के रूसी साहित्यकारों में अपनी अलग पहचान बनाई|

स्ताफ़येव का जन्म 1924 में साइबेरिया के एक छोटे से कस्बे में हुआ| वह सात वर्ष के थे, जब उनकी मां नाव पलटने पर डूब गईं| सौतेली मां अपने सगे बेटे की देखभाल में ही लगी रहती थी, सो वह घर छोड़कर चले गए| कुछ समय तो आवारा जिंदगी बिताई, फिर उन्हें अनाथालय में डाल दिया गया| 1942 में वह फ़ौज में भरती हो गए और छह महीने तक पैदल फ़ौज के स्कूल में ट्रेनिंग पाकर 1943 में मोर्चे पर पहुँच गए| द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने तक वह एक पैदल सिपाही के तौर पर ही लड़ते रहे, कई बार गंभीर रूप से घायल हुए, “शूरवीरता” पदक और तमगे उन्हें मिले| लड़ाई के बाद उराल इलाके में जा बसे| कई पापड़ बेले, अंततः 1951 में स्थानीय अखबार में उनकी पहली कहानी छपी, साथ ही उस अखबार में नौकरी भी मिली| इसके बाद पूरे पचास वर्ष उन्होंने साहित्य की वेदी पर अर्पित किए| उनके सृजन के प्रमुख विषय दो थे – युद्ध और ग्रामीण जीवन| यह वह जीवन था, जो उन्होंने खुद जिया, जो उनके दिल की आपबीती थी|

युद्ध की विभीषिका से जो गुज़रे हैं, वही जानते हैं इससे जुड़ी निष्ठुरता और घृणा, भय और कष्ट, पीड़ा और वेदना! रूस के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध बीसवीं सदी का सबसा दुखद पृष्ठ है| 1941 – 1945 के उन भयावह दिनों को रूसी लोग कभी नहीं भूल सकते, क्योंकि शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जिसका कोई न कोई सगा इस विनाशलीला का ग्रास न बना हो| सरकारी आंकड़ों के अनुसार लड़ाई के मोर्चों पर और फासिस्टों के यातना शिविरों में हमारे देश – सोवियत संघ - के 2 करोड़ से अधिक लोग मारे गए| इन बरसों में लोगों ने जो दुख झेले, जो आंसू बहाए उनकी गिनती भला कौन कर सकता है! इन मोर्चों की नारकीय ज्वाला से जो जवान, जो युवक-युवतियां गुज़रे थे, जिन्होंने मौत की आँखों में आँखें डालकर देखी थीं, उन्हीं में से कई “मोर्चेवाले लेखक बने” और उन्होंने अपनी रचनाओं में उस अकल्पनीय विनाशलीला के बीच मौजूद एक आम आदमी की मानसिकता का चित्रण किया, जो एक ओर चरम बर्बरता और अमानवीयता देखता है, दूसरी ओर अथाह दया, प्रेम और शूरवीरता भी| ऐसे ही एक लेखक थे विक्टर अस्ताफ़येव, जिन्हें उनके जीते जी ही लोग कालजयी लेखक कहने लगे थे|

आज आप सुनेंगे उनकी कहानी ‘इंडिया’| कहानी की नायिका है एक साधारण रूसी लड़की – साशा| एक बार उसे कहीं रंग-बिरंगी तस्वीर वाले कागज में लिपटी साबुन की टिकिया मिलती है| इस तस्वीर को वह ‘इंडिया’ मान लेती है| इस बच्ची के लिए यह ‘इंडिया’ ही उसके जीवन का सपना है| उसकी छोटी सी जिंदगी इसी सपने को संजोये गुज़रती है| इसी ‘इंडिया’ का नाम लेते हुए वह प्राण छोड़ती है| यह है एक आम रूसी परिवार की कहानी और लड़ाई में एक आम मौत की भी| बूढ़ा सिपाही जवां लड़की की आँखें मूंदते हुए न जाने किससे पूछता है: “ऐसी मासूम को क्यों...”| यही तो है दुर्भाग्य कि ऐसे जवानों को, जिन्होंने न साजन-सजनी को जाना, न घर परिवार को, युद्ध ने सबसे पहले और सबसे अधिक संख्या में मौत के घाट पहुँचाया| अस्ताफ़येव सौभाग्य से जिंदा बच गए और उन्होंने हमें इस दुर्भाग्य की गाथा सुनाई| साथ ही सुनाई कथा ‘इंडिया’ नाम के सपने की, उस सपने की, जो न जाने कब से रूसी इंसान के मन में बसा हुआ है|

इंडिया

पांच भाइयों की इकलौती बहन नन्ही साशा एक छोटे शहर में रहती थी| एक बार उनके शहर की सबसे बड़ी दुकान में आग लग गई| आग बुझाई गई, पुलिस का पहरा हटा, तमाशबीन भी अपने-अपने रास्ते चल दिए| अब आई बारी लौंडों की, भस्म हुई दुकान पर वह टूट पड़े, उसके अँधेरे कोनों में, दुकान की भूल-भुलैया में शुरू हुई उनकी खोजबीन| किसी के हाथ लगा बिना चाबी का ताला, तो कहीं राख के ढेर तले कोई और चीज़, जो आग से तपकर यों बदल चुकी होती कि पता ही न चलता थी क्या| साशा के भाइयों को एक खूब बड़ा ढेला मिला – चाकलेट की बिना पन्नी वाली टाफियां आग से पिघल कर आपस में जुड़ गई थीं - उनका था यह ढेला|

छोरियों कोदुकान के मलबे के पास फटकने तक की इजाज़त नहीं थी| बस साशा ही कुछ टटोल-पटोल कर सकती थी – कारण स्पष्ट था, आखिर पांच भाइयों की चहेती बहन थी, और भाई भी ऐसे कि जिसे चाहें दबा दें|

सारी टटोल-पटल में साशा के हाथ बस एक बटन लगा, अपना पूरा जोर लगाकर उसने इस बटन को चमका दिया, पता चला कि उस पर तो सितारा भी बना हुआ है| साशा ने इसे भी हाथ लगी दौलत माना| भाइयों को जो मिलता उस पर वह बेहद खुश होती| आंगन में अपनी कोठारी में भाई कितनी सारी चीजें पहुंचा चुके थे, जिनमें एक लोहे का पलंग भी था| हां, चाकलेट का ढेला भाई घर ले गए, कई दिन तक सारा परिवार इस मिठाई का मज़ा लेता रहा| इससे पहले उनके घर में कभी किसी ने चाकलेट की टाफी चखी तक न थी|

दिन बीते, हफ्ते बीते| पूरा महीना गुज़र गया – खोजी फ़ौज विरली हो गई| अब राख और मलबे के ढेर को उलटते – पुलटते लौंडों की आवाज़ें कभी-कभार ही सुनाई देती थीं| बड़े भी उस आग की बातें कभी-कभार ही करते थे| जली दुकान के बदले नई बड़ी दुकान बनने लगी|

पर जाने कौन सी ताकत थी जो ना-ना करते भी साशा के पांव इस मायूस जगह की ओर मोड़ देती| साशा गुम-सुम सी, थकी-मांदी घर लौटती| वह पैदा ही नरमदिल हुई थी, और अब तो उसकी दिन पर दिन बढ़ती नेकी और विनम्रता पर सब चकित थे| उधर मलबे पर उग आई घास घनी होती जा रही|

एक दिन साशा को वहाँ एक पुराना घोंसला दिखा और उसके पास ही जमीन पर पन्नी मे लिपटी कोई टिक्की| साशा ने उसे उठाया और ... बुत की बुत खड़ी रह गई|

जाने किस चमत्कार ने इस रंग-बिरंगी पन्नी को आग में भस्म होने से बचा लिया था| पीली पगड़ी और लाल चोगा पहने नीली आँखों वाला राजकुमार इस पन्नी से साशा को निहार रहा था, उसकी पीठ पीछे थे हरे-हरे नारियल के पेड़ और उनके बीच दबे पांव कहीं जा रहा था चीता, बिलकुल उनके अपने घर के बिल्ले जैसा| “इंडिया” – तस्वीर को देखते हुए साशा बुदबुदाई और उसने टिक्की सूंघी| ऐसी मीठी सुगंध साशा के नाक में भर गई कि उसका ऊपर का साँस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया| साशा ने टिक्की को छाती से लगा लिया, उसे पूरा विश्वास था कि सुदूर रहस्यमय देशों की सुगंध ऐसी ही होनी चाहिए, और फिर से कहा: “इंडिया”! वह घर को दौड़ चली, आंगन के गेट से ही चिल्लाई : “माँ! पापा!| भैया! मैनें इंडिया ढूंढ लिया!”

दूधिया सफेद पन्नी में लिपटी थी लाल साबुन की टिकिया| साशा की मां ने साबुन की टिकिया तो संदूक में बंद कर दी| त्यौहार वाले दिन या इम्तहान के दिन बच्चों को वह टिकिया नहाने के लिए मिलती थी| टिकिया की पन्नी साशा ने अपने पास रख ली| अब उसका सबसे प्यारा मनबहलाव था इस तस्वीर को – राजकुमार, हरे-हरे पेड़ों और चीते को निहारना| हर बार वह इस तस्वीर में कुछ नया ढूंढ लेती – कभी राजकुमार की पगड़ी पर बना सितारा, कभी पेड़ों की हरियाली में छिपा पंछी या फल| जब तस्वीर पर बनी सभी चीजें उसने ढूंढ लीं और उन्हें जी भरकर निहार लिया, मन में धर लिया, तो फिर वह उन चीजों की, उन पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की कल्पना करने लगी, जो उसकी समझ के मुताबिक परियों के देश इंडिया में होने चाहिए|

बाद में साशा कभी यह याद नहीं कर पाई कि पन्नी की तस्वीर देखकर उसके मन में इंडिया का ही ख्याल क्यों आया था| हो सकता है उसने इस देश के बारे में अपने भाइयों से कुछ सुना हो, जो उसे कभी-कभार कहानियाँ पढकर सुनाते थे; या फिर कहीं सिनेमा में, जहाँ भाई ही उसे दो-एक बार ले गए थे, देखी कोई बात मन में बैठ गई हो; या फिर अपने आप में खोई रहनेवाली बच्ची को कोई सपना आया हो, “इंडिया” नाम के किसी चमत्कार का, किसी जादुई चिड़िया का|

साशा बड़ी हो गई, स्कूल जाने लगी, वहाँ वह समय भी आया जब पहले भूगोल में और फिर इतिहास में उनके इंडिया के पाठों की बारी आई| पर अजीब बात थी कि यह इंडिया, जिसका पुस्तकों में वर्णन था, जिसके बारे में टीचर बताते थे और जिस पर उन्हें क्लास में बोलना होता था - यह इंडिया उसके मन को ज़रा भी नहीं छूता था| नन्ही बच्ची ने अपने लिए जो इंडिया खोजा था और जिसे वह इतने प्यार से अपने दिल में संजोए हुए थी, उसका और इस किताबी इंडिया का कोई नाता ही नहीं लगता था|

सातवीं के बाद मां-बाप ने उसे शहर के टेलीफोन एक्सचेंज में ट्रेनिंग पर लगवा दिया| भाइयों ने जली दुकान में जो पलंग ढूंढ निकाला था, उसे लाकर बड़े कमरे में एक कोने में लगा दिया| साशा ने सिरहाने के ऊपर कीलों से अपनी इंडिया की तस्वीर दीवार पर लगा ली| कुछ समय बाद ट्रेनिंग पूरी करके वह टेलीफोन-ऑपेरटर बन गई| अब वह पगार लाने लगी| उसी एक्सचेंज मे एक टेक्नीशियन काम करता था, अच्छे घर का लड़का था, कितनी ही किताबें पढ़ चुका था| रोज़ाना साशा को काम के बाद वह घर छोड़ने आने लगा| मेल-मिलाप बढ़ता गया, घरवाले ब्याह की तैयारी करने लगे, पर कर नहीं पाए, साशा नहीं ब्याही| गर्मियों में लड़ाई शुरू हो गई| फासिस्टों के हमले का सामना करने साशा के तीनों बड़े भाई और कुछ समय बाद उसका दूल्हा भी मोर्चे पर चले गए|

लड़ाई लंबी थी और बेहद खूनी| मोर्चों पर लड़ने के लिए लाखों लोग चाहिए थे| लड़ाई शुरू होने के साल भर बाद साशा की भी लामबंदी हो गई|

बड़े भाइयों के पीछे-पीछे दो छोटे भाई भी घर छोड़ गए| साशा सबसे बाद में घर से गई थी| लड़ाई में साशा को उसका अपना, फोन-ऑपेरटर का काम ही करना पड़ा| वह अच्छा काम करती थी, फौजी कमांडरों और बड़े अफसरों का हर आदेश जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश करती थी| फोन की लाइन अगर कट जाती, तो साशा बहुत दुखी होती| अत्युत्तम काम के लिए और अनेक बार गोलीबारी होते हुए कटी फोन-लाइन ठीक करने के लिए उसे दो तमगे मिले और एक पदक के लिए भी उसका नाम भेज गया|

इस बीच साशा का दूल्हा मोर्चे पर मारा गया था और साशा का एक भाई भी| तीन बड़े भाइयों में से दो लड़ाई के शुरू में ही लापता हो गए थे| बेचारे दुश्मन के कैदी बने यातनाएं झेल रहे होंगे|

साशा का तो स्वभाव ही ऐसा था कि वह अपने ख्यालों में डूबी रहती थी, बहुत कम बोलती थी, अब इन सब दुखद समाचारों और मोर्चे की कठोर जिंदगी ने उसे एकदम गुमसुम, यहाँ तक कि सख्त सी बना दिया| बस कभी-कभार ही जब मोर्चे पर थोड़ी देर के लिए शांति हो जाती, तो ऐसे क्षणों में इस सख्त फोन-ऑपेरटर के चेहरे पर और उसकी ख्यालों में डूबी आँखों में बटालियन कमांडर को कोमल मुस्कान दिखती और उसे लगता कि यह लड़की इस वक्त मोर्चे पर नहीं है, बल्कि कहीं बहुत ही दूर है| कमांडर के दिल में उसके लिए बेटी के जैसा स्नेह था,तरस भी आता था इस मासूम पर| एक बार उसने हौले से पूछने की कोशिश की कि किस बात पर वह यों मुस्करा रही है, किन सपनों में खोई है?

“कामरेड कैप्टन, मैं इंडिया की सोच रही हूँ,” वह तत्परता से बोली|

ऐसा जवाब सुनकर बटालियन कमांडर उलझन में पड़ गया, यहाँ तक कि कुछ डर सा गया| और कुछ न पूछना ही उसने बेहतर समझा, बस उससे बोला कि वह ठीक से सोए, नींद पूरी कर ले|

जाड़ों के दिन थे, घमासान लड़ाई चल रही थी| जिस बटालियन में साशा फोन-ऑपेरटर थी, उसमें लोग भी कम रह गए थे और तोपें भी| तो भी बटालियन दुश्मन से जूझ रही थी, उस पर गोले बरसा रही थी, इसके लिए तोपचियों को चाहिए था कि फ़ोन-लाइन रात-दिन काम करे|

एक बार दिन ढले फासिस्टों ने साशा की बटालियन की प्रेक्षण चौकी पर गोलाबारी की, गोले के टुकड़े से फोन की लाइन कट गई| साशा लाइन जांचने निकली| गांव में एक ही कच्ची सड़क थी, उसी के किनारे-किनारे लाइन बिछी हुई थी| बर्फीली आंधी चल रही थी, सारी लाइन पर हिम के ढेर लगे हुए थे|

छाती तक हिम के ढेर में घुसकर साशा फोन का तार निकाल-निकाल कर देखती जा रही थी| उसने मोर्चे पर काम करना सीख लिया था, हमेशा लाइन बिछाते हुए कोई न कोई निशानी बनाती जाती थी| जल्दी ही वह उस जगह तक पहुँच गई, जहाँ लाइन कटी थी| मगर वह लाइन जोड़ नहीं पा रही थी| लाइन हिम तले दब गई थी, और वह तार के टूटे सिरे मिला नहीं पा रही थी| साशा में इतना जोर नहीं था कि तार के एक सिरे को दूसरे तक खींच लेती, एक्स्ट्रा तार वह जल्दबाजी में अपने साथ रखना भूल गई थी| तभी फासिस्टों ने गांव पर ज़ोरदार गोलाबारी शुरू कर दी| साशा घायल हो गई, लगा जैसे उसका पेट किसी तेज़, नुकीली चीज़ से टकरा गया है| वह हिम के ढेर में गिर पड़ी, उसमें से निकलने की उसने कोशिश की, पर शरीर में इतनी ताकत नहीं थी| साशा ने हाथ-पांव चलाने बंद कर दिए| उसे लगा शरीर में गर्माहट आ रही है, मन शांत हो गया, पेट में दर्द भी जैसे थम गया| उसे नींद आने लगी|

जैसे ही साशा की आँखें बंद हुईं, उसे दिखा अपना घर, अपना बिस्तर और सिरहाने के ऊपर – इंडिया देश| धुंधले कोने में से नीली आँखों वाला राजकुमार उसे निहार रहा था - सुंदर चोगा और पीली पगड़ी पहने, जिस पर था हीरे का सितारा| कितना प्यारा था वह – उसके रोम-रोम को वह जानती-पहचानती थी, अपना सगा था वह! राजकुमार की पीठ पीछे हरे-भरे पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे, और दे रहे थे शीतल हवा का स्पर्श - साशा की जांघ पर, वहाँ तो जैसे आग की लपटें उठ रही थीं, दिल तक पहुच रही थीं| ...

तहस-नहस गांव में एक बूढ़ा सिपाही घोड़गाड़ी पर धीरे-धीरे चला जा रहा था| चलते-चलते उसे रास्ते के किनारे एक सिपाही का कनटोप दिखा| “कनटोप यहाँ है, तो सिपाही भी कहीं पास में होना चाहिए,” उसके मन ने कहा| घोड़े को रोककर वह इधर-उधर नज़रें घुमाने लगा, पर कुछ दिखा नहीं उसे| हां, थोड़ी दूरी पर, हिम के ढेर के ऊपर जंगले पर लकड़ी की पेटी में फोन लटक रहा था| “फोन यहाँ है, तो ऑपरेटर भी यहीं होना चाहिए,” बूढ़े सिपाही के मन ने कहा और वह हिम के ढेर को खोदने लगा|

“हाय, मेरी बच्ची!” हिम के ढेर तले से लड़की निकली, तो बूढ़े सिपाही की आवाज़ कांप गई| अपने गरम हाथ से उसने लड़की के चेहरे से हिम की परत साफ की, बहुत संभाल के उसे दोनों बाँहों में उठाया और अपनी घोड़गाड़ी तक ले गया| यहाँ उसने फोन-ऑपेरटर को ध्यान से देखा और उसके पेट पर गरम चैस्टर तले खासा बड़ा घाव पाया, जिससे खून रिस रहा था| सिपाही सबसे ज़रुरी काम करने लगा – घाव पर पट्टी बांधने लगा, साथ ही हौसले के लिए कहता जा रहा था:

“कोई नहीं – कोई नहीं, अभी पट्टी किए देता हूँ, फिर अस्पताल पहुंचा दूँगा| डर मत, तुझे अकेली नहीं छोडूंगा| कहाँ की है? ... चुप है? ठीक है, चुप रह, ताकत बचाए रख| बहुत ताकत चाहिए होगी... ब्याह पर चाहिए होगी... ब्याह तक भली-चंगी ही जाएगी, हां, ज़रूर हो जाएगी|”

पट्टी करके बूढ़े सिपाही ने अपनी चपटी फौजी बोतल में से पानी का एक घूंट लड़की के मुंह में डाला - मुंह से तपता साँस रुक-रुक कर निकल रहा था| एक पल को सिपाही ने सिर घुमाकर अपने चेहरे से हिम की परत पोंछी|

“क्यों भला ... ऐसी मासूमों को क्यों?...” हिमानी आंधी की सांय-सांय के बीच न जाने किससे उसने यह सवाल पूछा| फिर सिगरेट जलाई और घोड़े को छूकर चलने का इशारा किया| घोड़ा भी उसके ही जैसा बूढ़ा और उदास था|

घायल लड़की कुछ बुदबुदाई| गहरी सोच में डूबे सिपाही का ध्यान टूटा, उसने घोड़े को थामा| सिर घुमाया और दंग रह गया – लड़की की आँखें खुली हुई थीं और वह मुस्कराती हुई उससे दूर, इस हिमानी आंधी से भी दूर कहीं देख रही थी| सिपाही ने उसके मुंह की तरफ अपना सिर झुकाया|

“नमस्ते, इंडिया! नमस्ते...”

और किसको उसने नमस्ते की - वह समझ नहीं सका, लड़की की आवाज़ खो गई, बस एक लंबी, चैन की उसांस बूढ़े सिपाही के कानों तक पहुंची|

अपने मूंदे सिर से उसने कनटोप खींच लिया और सिर झुकाए घोड़ागाड़ी के पास खड़ा रहा| लड़की की आँखें न जाने किस सुखद नज़ारे पर टिककर रह गई थीं, सिपाही उन पर हिम की परतें लगती देखता रहा|

सड़क के किनारे ट्रेंचें बनी हुई थीं| उन्हीं में से एक में बूढ़े सिपाही ने लड़की को लिटा दिया| चैस्टर से उसका सारा शारीर और मुंह भी ढक दिया और फिर हिम मिली मिट्टी तले दफना दिया|

पास के अहाते में किन्हीं फूलों की बची-खुची सूखी टहनियाँ हवा में डोल रही थीं| सिपाही ने सूखी फलियाँ मसलकर फूलों के बीज निकाले और उन्हें मिट्टी के ढेर पर, जिस पर इतनी सी देर में ही हिम की सफ़ेद परत बन गई थी, छिड़क दिया, ताकि इस लड़की की कब्र लड़ाई में झुलस रहे इस विशाल संसार में खो ना जाए| और चला गया|...

गर्मियां आईं, तो सिपाही की ट्रेंच पर चमकीले, रंग-बिरंगे फूल खिल आए| अब अगर कोई विरला राही इस गांव से गुज़रता है और पूछ लेता है कि गांव कि इस सुनसान सड़क के किनारे किसकी कब्र बनी हुई है, तो गांववाले कहते हैं: इंडिया नाम के सिपाही की|

यह अजीब सा नाम उस बूढ़े सिपाही ने बताया था, जो सन् बयालीस के जाड़ों में अपने बूढ़े घोड़ेवाली गाड़ी पर मोर्चे की अगली क़तार पर रसद पहुंचाता था|

http://hindi.ruvr.ru/2012_07_23/victor-astafiev-india/

23.07.2012, 15:14

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