रेरिख़ सन्धि की 80 वीं जयन्ती पर

Wednesday, 15 April 2015 16:04

रेरिख़ सन्धि - विभिन्न जातियों, धर्मों और देशों के बीच शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व का वास्तविक घोषणापत्र

  इन दिनों दुनिया के विभिन्न देशों में रेरिख़ सन्धि की 80 वीं जयन्ती को समर्पित तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। भारत में रूस के राजदूत और अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ स्मृति न्यास के आजीवन सदस्य और उपाध्यक्ष अलेक्सान्दर कदाकिन ने इस अवसर पर समाचार-समिति ’स्पूतनिक’ की संवाददाता नताल्या बेन्यूख़ को अन्तर्वार्ता दी।

  नताल्या बेन्यूख़: अप्रैल में रेरिख़ सन्धि को सामने आए 80 साल पूरे हो गए। आपकी नज़र में आज के दौर में इस अन्तरराष्ट्रीय सन्धि का क्या महत्त्व है?

  अलेक्सान्दर कदाकिन: इस सन्धि पर 15 अप्रैल 1935 को हस्ताक्षर किए गए थे। यह सन्धि कला और वैज्ञानिक संगठनों, ऐतिहासिक स्मारकों और कला-धरोहरों की सुरक्षा से सम्बन्ध रखती है। इस सन्धि पर वाशिंगटन में हस्ताक्षर किए गए थे। उस ऐतिहासिक हस्ताक्षर समारोह में 21 अमरीकी राज्यों के प्रतिनिधियों तथा निकलाय रेरिख़ के शिष्य़ और सहयोगियों को विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया था। लेकिन सब जानते हैं कि इस अनूठी सन्धि में शामिल धाराओं और अनुच्छेदों के बारे में महान् रूसी चित्रकार और विचारक निकलाय रेरिख़ ने बहुत पहले ही सोचना शुरू कर दिया था। सबसे पहले इस तरह की अन्तरराष्ट्रीय सन्धि करने का विचार निकलाय रेरिख़ के मन में 1903-1904 में उस समय आया था, जब वे प्राचीन रूसी नगरों की यात्रा कर रहे थे। इसके बाद दुनिया में हुए विश्व-युद्ध और रूस में हुई क्रान्ति से दुनिया में उथल-पुथल, मुसीबतों और तबाही का जो दौर शुरू हुआ, उससे रेरिख़ का यह विचार और मजबूत हुआ कि कला-धरोहरों की सुरक्षा के बारे में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सन्धि की जानी चाहिए। यह बात भी प्रतीकात्मक है कि इस सन्धि पर हस्ताक्षर उस दौर में किए गए, जब यूरोप के बीचोंबीच हिटलरी फ़ासीवाद पैदा हो रहा था और अपना सिर उठा रहा था। निकलाय रेरिख़, उनकी पत्नी येलेना रेरिख़ तथा उनके दोनों पुत्र यूरी और स्वितास्लाव रेरिख़ ने इस सन्धि का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार करने में कोई कोर-कसर उठा न रखी। उस दौर में ये लोग समझ रहे थे कि दुनिया में कितना भारी संकट पैदा होने जा रहा है, इसीलिए उन्होंने कला और सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट होने से बचाने के लिए कानूनी आधार की स्थापना करने की पूरी-पूरी कोशिश की।

 अब आठ दशकों बाद इस दृष्टि से किए गए उनके अथक प्रयासों और निःस्वार्थ रूप से किए गए काम को याद करना और उनके प्रति आभार व्यक्त करना बेहद ज़रूरी है। रेरिख़ सन्धि न केवल बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में सामने आए एक ऐसे अन्तरराष्ट्रीय वैधानिक दस्तावेज़ के रूप में महत्त्वपूर्ण है, जो मानवाजाति की सांस्कृतिक सम्पदा की सुरक्षा की समस्या का समाधान करता है, बल्कि यह मानवजाति के विकास में संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करता है। यह एक ऐसा सभ्य घोषणापत्र है जिसमें वे सिद्धान्त तय किए गए हैं, जिनका पालन किए बिना दुनिया में विभिन्न धर्मों, जातियों और देशों के लोग शान्तिपूर्ण ढंग से एक-साथ मिलकर नहीं रह सकते हैं।

  यह सन्धि काफ़ी व्यापक सन्धि है, जिसमें ऐतिहासिक और स्थापत्य स्मारकों, संग्रहालयों, वैज्ञानिक और कलात्मक रचनाओं, ललितकला और सजावटी कला की धरोहरों तथा कला और शैक्षिक संगठनों सहित सभी सांस्कृतिक निधियों के संरक्षण की बात कही गई है। इस सन्धि में सभी चल और अचल सांस्कृतिक उपलब्धियों तथा संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने वाले कर्मियों की सुरक्षा की भी बात कही गई है।

  मैं इस सन्धि की व्यापकता और उसके महत्त्व को रेखांकित करने वाली एक और बात का भी यहाँ उल्लेख करना चाहता हूँ। रेरिख़ सन्धि ने ही 1954 की उस हेग सन्धि के अग्रदूत की भूमिका निभाई थी, जिसमें सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर एक आन्दोलन चलाने की बात कही गई है। रेरिख़ सन्धि के आधार पर ही ऐसी बहुत सी मानवीय पहलें और परियोजनाएँ प्रस्तुत की गईं तथा अनेक प्रभावशाली सामाजिक संस्थाएँ सामने आईं, जिन्हें आज सारी दुनिया में मान्यता प्राप्त है और जिन्हें आज सारी दुनिया बड़े सम्मान के साथ देखती है।

  रेरिख़ सन्धि आज भी बड़ा सामयिक महत्त्व रखती है। वर्तमान काल में जब स्थानीय स्तर पर होने वाले युद्धों और लड़ाइयों तथा उग्रवादी  और आतंकवादी गतिविधियों की वजह से सांस्कृतिक निधियों का अस्तित्त्व ही ख़तरे में पड़ गया है, रेरिख़ सन्धि का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। आज के दौर में सामने आने वाले पाग़लपन के कारण जो अपूरणीय क्षति होती है, उसे देखकर हम स्तब्ध रह जाते हैं। ज़रा अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान उग्रवादियों द्वारा पहाड़ काट कर बनाई गई प्राचीन विशाल बौद्ध-मूर्त्तियों को खण्डित करने और नष्ट करने की कार्रवाइयों को याद करें, या आतंकवादी गिरोह ’इस्लामी राज्य’ (आई०एस०) के सदस्यों द्वारा इराक के विभिन्न नगरों के संग्रहालयों में अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों की लूटपाट और बर्बर ढंग से उनके विनाश को याद करें। लगभग ऐसी ही बर्बर कार्रवाइयाँ तथाकथित सभ्य यूरोप के कुछ देशों में  द्वितीय विश्व-युद्ध के दौर में विजय प्राप्त करने वाले नायकों के स्मारकों तथा उन संग्रहालयों के साथ भी की गईं हैं, जो फ़ासिज्म पर मानवजाति की विजय को समर्पित थे। आज द्वितीय विश्व-युद्ध में विजय की 70 वीं जयन्ती की पूर्ववेला में इस तरह की कार्रवाइयों की जितनी निन्दा की जाए, कम है।

  रूस के एकदम पास पूर्वी उक्राइना में भी आज जो कुछ घट रहा है, उसे देखकर भी मन में भारी चिन्ता पैदा होती है। पूर्वी उक्राइना के स्लवयान्स्क, लुगान्स्क और दूसरों शहरों में उक्राइना सेना ने आर्थोडॉक्स ईसाई गिरजों पर भयानक गोलाबारी की है, जिसकी वजह से अनेक गिरजे और महागिरजे ध्वस्त हो गए हैं। उक्राइना की सरकारी सेना की इन बर्बर कार्रवाइयों के कारण गरलोफ़्का में बने लकड़ी के बेहद ख़ूबसूरत प्राचीनकालीन ब्लागावेशेन्स्क कैथेड्रिल में आग लग गई और वह जलकर ख़ाक हो गया। दनेत्स्क में दनेत्स्क के राजकीय संग्रहालय पर की गई गोलाबारी के कारण उसका एक हिस्सा नष्ट हो गया, जहाँ अनेक कला-धरोहरें और ऐतिहासिक दस्तावेज़ रखे हुए थे। इसके अलावा गर्लोफ़्का के ललित-संग्रहालय के बारे में भी हमारे पास कोई सूचना नहीं है, जहाँ लम्बे समय तक युद्ध चल रहा था। गर्लोफ़्का संग्रहालय में  निकलाय रेरिख़ की 28 पेण्टिंगें भी रखी हुई थीं, जो उन्होंने सन् 1893 से 1916 के बीच बनाई थीं। रेरिख़ के चित्रों का उक्राइना में यह सबसे बड़ा संग्रह है। हमें तो अभी तक यह भी नहीं मालूम है कि क्या यह संग्रह सुरक्षित बच गया है या नहीं? हम इस सिलसिले में लोगों को भड़काना नहीं चाहते, लेकिन यह सोच कर डरे हुए हैं कि उक्राइना में रूस विरोधी भावनाओं की आग में कहीं निकलाय रेरिख़ जैसे महान् चित्रकार के चित्रों की ही आहुति न पड़ गई हो, जो संस्कृति के माध्यम से दुनिया को सुरक्षित रखने का सपना देखा करता था। तभी तो निकलाय रेरिख़ ने रेरिख़ सन्धि जैसे दस्तावेज़ की रचना की थी ताकि सारी दुनिया में सांस्कृतिक विरासतों और कला-धरोहरों को सुरक्षित रखा जा सके। आपसे बात करते हुए अचानक ही मुझे रेरिख़ की वह पेण्टिंग याद आ गई है, जिसमें उन्होंने युद्ध के भयानक परिणामों के बारे में चेतावनी दी है।

  नताल्या बेन्यूख़:  अलेक्सान्दर जी, आप अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ स्मृति न्यास के आजीवन सदस्य और उपाध्यक्ष भी हैं। आप जानते ही हैं कि रेरिख़ परिवार भारत को अपनी दूसरी मातृभूमि मानता था। भारत में रेरिख़ परिवार की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए क्या किया जा रहा है? कैसे भारत में रूस के साथ मिलकर रेरिख़ परिवार की विरासत का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है?

  अलेक्सान्दर कदाकिन: भारत में रेरिख़ परिवार की कलात्मक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विरासत को अमूल्य माना जाता है। करोड़ों भारतीय लोगों के लिए रेरिख़ परिवार दशकों तक रूस और भारत के बीच बहुमुखी सांस्कृतिक-ऐतिहासिक सम्पर्कों का प्रतीक रहा है। जब भी मैं हिमाचल प्रदेश के नग्गर स्थित रेरिख़ संग्रहालय में जाता हूँ, मुझे हर बार यह अहसास होता है कि भारतीय लोग रेरिख़ को कितना चाहते हैं। यहीं, नग्गर में ही पिछले पच्चीस साल से अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ स्मृति न्यास बना हुआ है। यहाँ मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि निकलाय रेरिख़ के सुपुत्र स्वितास्लाफ़ रेरिख़ ने इस न्यास का गठन करने की ज़िम्मेदारी मुझे ही सौंप दी थी। वे चाहते थे कि रेरिख़ की इस जागीर पर एक आधुनिक संग्रहालय स्थापित कर दिया जाए। बीते सालों में इस दिशा में हमने बहुत कुछ किया है। स्वितास्लाफ़ रेरिख़ ने इस संग्रहालय की शुरूआत बड़े मामूली क़दमों से की थी। भारत स्थित रूसी दूतावास में काम करने वाले हमारे सहयोगी  शनिवार और रविवार के दिन यहाँ आकर श्रम-दान किया करते थे, ताकि निकलाय रेरिख़ के इस घर को संग्रहालय का रूप दिया जा सके।

  आज रेरिख़ का यह स्मारक-संग्रहालय हिमाचल-प्रदेश का एक सबसे लोकप्रिय दर्शनीय-स्थल बन गया है। हर साल भारत, रूस और सारी दुनिया के एक लाख से ज़्यादा पर्यटक इस संग्रहालय को देखने आते हैं। अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ स्मृति न्यास के प्रयासों की बदौलत और रेरिख़ परिवार की मित्र तथा संग्रहालय की देखभाल करने वाली पहली केयरटेकर जर्मनी की उर्सूला आयख़श्टाट, उनके बाद दस साल तक वहाँ काम करती रहीं दूसरी केयरटेकर अल्योना अदमकोवा और आजकल वहाँ काम कर रहीं लरीसा सुरगीना की वजह से रेरिख़ संग्रहालय में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कभी वहाँ कोई चित्र-प्रदर्शनी लगी होती है, यो कभी कोई सेमिनार हो रहा होता है, कभी कोई व्याख्यान होता है तो कभी बच्चों की चित्र-रेखांकन प्रतियोगिता चल रही होती है। इसके अलावा दिल्ली स्थित रूसी दूतावास और विदेशों के साथ रूसी सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद ’रोस-सत्रूदनिचेस्तवा’ के सहयोग से यहाँ एक नई परम्परा भी शुरू हुई है। साल में दो बार यानी वसन्त में और शरद में निकलाय रेरिख़ और स्वितास्लाफ़ रेरिख़ के जन्मदिन के अवसर पर यहाँ रूसी सांस्कृतिक महोत्सवों का आयोजन किया जाता है। हाल ही में आयोजित ऐसे ही एक महोत्सव में दो रूसी गायन, नृत्य और संगीत मण्डलियों ने भाग लिया था, जिनके द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम बेहद सफल रहे।

  हालाँकि अभी बहुत सा काम बाक़ी है। जैसे निकलाय रेरिख़ के आवासीय परिसर और संग्रहालय की मरम्मत कराने का समय आ गया है। मास्को के अन्तररष्ट्रीय रेरिख़ केन्द्र ने रूसी विशेषज्ञों की सहायता से मरम्मत के इस काम की सारी रूपरेखा तैयार कर ली है। हम तुरन्त यह काम शुरू कर देना चाहते हैं। अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ स्मृति न्यास की दिसम्बर 2014 में हुई बैठक में इस सिलसिले में व्यापक रूप से विचार-विमर्श हो चुका है। लेकिन हमेशा जो चाहो, जैसा चाहो, वैसा ही नहीं होता है। न्यास की बैठक ने दिखाया कि हमारे भारतीय सहयोगी भी नग्गर स्थित रेरिख़ की इस जागीर को एक अत्याधुनिक सांस्कृतिक संग्रहालय और विश्व स्तरीय शैक्षिक केन्द्र में बदलने की इच्छा रखते हैं। मेरा ख़याल है कि इस सारी योजना को भली-भाँति पूरा करने के लिए स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ भारत की केन्द्रीय सरकार को भी हमारे साथ शामिल होना चाहिए। इस काम में हमें भारत के विदेश मन्त्रालय और संस्कृति मन्त्रालय तथा भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की सहायता की भी ज़रूरत पड़ेगी। इसके अलावा हम प्रायोजकों और चेरिटेबल संस्थाओं से भी सहयोग लेने को उत्सुक हैं।

  भारत में रेरिख़ परिवार की विरासत में बंगलुरु के पास तातागुनी में स्थित स्वितास्लाफ़ रेरिख़ और उनकी फ़िल्म अभिनेत्री पत्नी देविका रानी की जागीर भी शामिल है। पिछली सदी के अन्तिम दशक के मध्य से कर्नाटक सरकार द्वारा बनाई गई एक समिति तातागुनी के विकास पर नियन्त्रण रखती है। विगत फ़रवरी में मैं आख़िरी बार तातागुनी गया था। वहाँ भी मरम्मत का काम चल रहा है। जागीर के आस-पास फैले पार्क की साज-सँवार की जा रही है। जागीर की ज़मीन पर वृक्षारोपण का काम जारी है। कर्नाटक सरकार ने इस काम के लिए क़रीन 8 लाख 20 हज़ार डॉलर का अनुदान दिया है। हालाँकि जागीर में बने तालाब की हालत बहुत अच्छी नहीं है। पहले यह तालाब इस जागीर की ख़ूबसूरती में चार-चाँद लगाता था, अब वो आधा सूख चुका है। आसपास बसे मुहल्ले वाले इस तालाब के पानी का अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। तातागुनी विकास समिति के सदस्यों से मुलाक़ात के दौरान मैंने उनका ध्यान इस ओर दिलाया कि इस तालाब की देख-रेख करनी भी ज़रूरी है। मेरा ख़याल है कि कर्नाटक सरकार इस समस्या का समाधान कर देगी। कर्नाटक सरकार कई बार यह बात कह चुकी है कि तातागुनी का विकास उस योजना के अनुसार ही किया जाएगा, जो योजना बना ली गई है। तातागुनी को लेकर बंगलौर के नगर प्रशासन ने कई तरह की उल्टी-सीधी योजनाएँ बनाई हैं, लेकिन सरकार उन पर सहमत नहीं होती। एक बार वहाँ कूड़ाघर बनाने की योजना सामने आई थी। फिर उसके बाद बंगलुरु में मैट्रो का विकास करने के लिए भी तातागुनी की ज़मीन का इस्तेमाल करने की बात की गई थी।

  रूस की सरकार तातागुनी का विकास अत्याधुनिक संग्रहालय और शैक्षिक-सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में करने के लिए उठाए गए सभी क़दमों का पूरा-पूरा समर्थन करती है। स्वितास्लाफ़ रेरिख़ के चित्रों को एक जगह इकट्ठा करके उनकी प्रदर्शनी आयोजित करने की दिशा में भी तुरन्त क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है। बंगलुरु की आर्ट गैलरी में स्विस्लाफ़ रेरिख़ के 50 से ज़्यादा चित्र सुरक्षित हैं। उनमें से कुछ चित्रों  का जीर्णोद्धार करने की ज़रूरत है। हम आर्ट गैलरी के संचालकों से इस सिलसिले में बात कर रहे हैं कि श्रेष्ठ रूसी विशेषज्ञों को यह काम करने दिया जाए। मुझे विश्वास है कि हमारे सामूहिक प्रयासों की माध्यम से तातागुनी भारतीय और रूसी पर्यटकों सहित देश-विदेश के पर्यटकों के लिए दक्षिणी भारत का न केवल एक आकर्षक दर्शनीय-स्थल बन जाएगा बल्कि वह रूसी भारतीय मैत्री और हमारे दो देशों की जनता की भावनात्मक व सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी कहलाएगा।

  नताल्या बेन्यूख़: रेरिख़ सन्धि की 80 वीं जयन्ती के सिलसिले में भारत में किस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करने की योजना है?

  अलेक्सान्दर कदाकिन: वैसे तो भारत में पिछले साल ही इस जयन्ती से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे थे। और यह उचित भी है क्योंकि जब रेरिख़ सन्धि तैयार की गई थी और जब उस पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब निकलाय रेरिख़ भारत में हिमालय पर्वत माला की गोद में बसे नग्गर नामक स्थान पर रहने लगे थे और वहीं रहकर अपने सारे काम किया करते थे। रेरिख़ सन्धि में ऐसी बहुत-सी चीज़ें शामिल हैं, जो भारत से सम्बन्ध रखती हैं। विशेष तौर पर रेरिख़ का प्रसिद्ध शान्ति-ध्वज 1938 में पहली बार कराची में आयोजित एक समारोही कार्यक्रम में ही फहराया गया था। कराची तब ब्रिटिश इण्डिया के प्रमुख नगरों में से एक नगर माना जाता था। फिर इसके दस साल बाद अगस्त, 1948 में स्वतन्त्र भारत के प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने रेरिख़ सन्धि से जुड़ने और उसकी पुष्टि करने का निर्णय लिया था।

  सन् 2014 में रूस स्थित भारतीय दूतावास के समर्थन से मास्को स्थित अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ केन्द्र ने भारत में ही सबसे पहले रेरिख़ सन्धि की 80 वीं जयन्ती को समर्पित एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था। इस प्रदर्शनी को नाम दिया गया था — ’रेरिख़ सन्धि: इतिहास और समकालीनता’। प्रदर्शनी में अनेक अभिलेखीय दस्तावेज़, तस्वीरें तथा निकलाय रेरिख़ और स्वितास्लाफ़ रेरिख़ के चित्रों व रेखांकनों की प्रतिकृतियाँ शामिल की गई हैं। पिछले छह महीने में यह प्रदर्शनी शिमला, नग्गर, चण्डीगढ़, गाँधीनगर आदि शहरों में लगाई गई है और बड़ी सफल रही है। इस साल इस प्रदर्शनी का आयोजन भारत के अन्य कई नगरों और महानगरों में किया जाएगा, जहाँ के निवासी इस प्रदर्शनी को देख सकेंगे।

  आजकल हम मास्को स्थित अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ केन्द्र की सहायता से निकलाय रेरिख़ के चित्रों की एक बड़ी प्रदर्शनी का आयोजन करने की योजना बना रहे हैं। इस प्रदर्शनी को हमने नाम दिया है — ’पवित्र विजय का वसन्त’। यह प्रदर्शनी पहले नई दिल्ली में लगाई जाएगी, उसके बाद हम इसे नग्गर में प्रदर्शित करेंगे। इसके बाद यह प्रदर्शनी उन सभी शहरों में लगाई जाएगी, जहाँ-जहाँ रूसी सांस्कृतिक केन्द्र बने हुए हैं। हम चाहते हैं कि यह प्रदर्शनी रेरिख़ सन्धि के सार को प्रदर्शित करे। वह इस बात की अपील करे कि हमें अपनी इस दुनिया को और दुनिया में शान्ति को सुरक्षित रखना चाहिए। हमें मानवीय सांस्कृतिक उपलब्धियों की सुरक्षा करनी चाहिए। दर्शक इस प्रदर्शनी को देखकर उन तस्वीरों में व्यक्त इस बात को समझे कि हमेशा बुराई पर भलाई की ही जीत होती है। रेरिख़ सन्धि की 80 वीं जयन्ती के साथ-साथ यह प्रदर्शनी द्वितीय विश्व-युद्ध में विजय की 70 वीं जयन्ती को समर्पित कार्यक्रमों की योजना का भी एक प्रमुख कार्यक्रम सिद्ध होगी।

 

 

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