रोरिक संधि 21 वीं सदी में अस्तित्व और प्रगति का एक आह्वान है

Wednesday, 15 April 2015 16:01

रोरिक संधि 21 वीं सदी में अस्तित्व और प्रगति के वैश्विक एजेंडे में संस्कृति को फिर से केंद्र में समाहित करने के लिए लिए 20 वीं सदी का एक आह्वान है।

भारत और रूस को इस आह्वान पर ध्यान देना चाहिए। यह राय अंतर्राष्ट्रीय रोरिक मेमोरियल ट्रस्ट के ट्रस्टी बोर्ड के सदस्य सुधीन्द्र कुलकर्णी, जो प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के सलाहकार भी रह चुके हैं, ने रोरिक संधि की 80वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य पर सूचना और प्रसारण एजेंसी ‘स्पुतनिक’ की संवाददाता नतालिया बेन्युख को दिए एक साक्षात्कार में प्रस्तुत की| प्रस्तुत है उनका साक्षात्कार-
 
प्रश्न: रोरिक संधि इस वर्ष अपनी 80 वीं वर्षगांठ मना रही है। भारत और रूस समेत दर्जनों देश पिछले कुछ वर्षों में इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं और इस दस्तावेज़ के पालन के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन दुनिया के विभिन्न भागों में उथल-पुथल, संघर्ष और युद्ध के कारण अभी भी अमूल्य सांस्कृतिक सम्पतियों को नष्ट किया जा रहा है। आप के अनुसार, रोरिक संधि के लक्ष्य और कार्य कितने यथार्थवादी हैं? आप इस दस्तावेज़ के महत्व का क्या आंकलन करते हैं?

उत्तर: मेरा विश्वास है कि समय के साथ रोरिक संधि के महत्व में कोई कमी नहीं आयी है| इसका कारण यह है कि संधि की शांति का बैनर प्रतीक वाली संस्थापक दृष्टि ने अभी अपनी प्रासंगिकता खोई नहीं है| निकोलस रोरिक ने जिन शब्दों में इस दृष्टि को वर्णित किया था वो आज भी उसी प्रेरणादायक-शक्ति और तात्कालिकता की भावना के साथ हमें संबोधित करते हैं|  "रेड क्रॉस झंडा जैसे शारीरिक स्वास्थ्य के संरक्षण का प्रतीक है, वैसे ही हमारा शांति का बैनर मानवता के आध्यात्मिक स्वास्थ्य के रक्षक रूप में है|’ क्या रेड क्रॉस मिशन का अंत आ गया है? नहीं, तो शांति के बैनर मिशन का अंत कैसे आ सकता है? दुनिया में तब तक रोरिक संधि की जरूरत रहेगी, जब तक मानवता की संस्कृति, कला और अध्यात्म जैसी अनमोल विरासतों पर खतरे मंडराते रहेंगे| 
दरअसल, रोरिक संधि का महत्व आज के समय में अधिक बढ़ गया है। इसका पहला कारण यह है कि मानवता की विविध विरासतों- सांस्कृतिक, कलात्मक और आध्यात्मिक- पर पारंपरिक के साथ साथ अब गैर-परंपरागत सशस्त्र हमलों जैसे आतंकवाद से भी सतत ख़तरा बना हुआ है| हम यह जानते हैं कि कैसे अफगानिस्तान में आतंकवाद और धार्मिक अतिवाद के बलों द्वारा बामयान की बुद्ध प्रतिमाओं को नष्ट किया गया| हाल ही में इस्लामी राज्य ने इराक, सीरिया और यमन में कला की कृतियों को जानबूझ कर सिर्फ इसलिए नष्ट कर दिया, क्योंकि वह उनकी समझ से परे थीं|
सांस्कृतिक एवं कलात्मक विरासत के लिए एक और गैर पारंपरिक और पूरी तरह से नया खतरा पर्यावरण-क्षरण और जलवायु-परिवर्तन की तरफ से है| रोरिक के समय में यह खतरा लगभग न के बराबर था| यह एक नई घटना है जिसने हाल के दशकों में एक खतरनाक गति हासिल कर ली है| दरअसल महासागर, नदियाँ, झीलें, जंगल और पहाड़ प्रकृति की अपनी अनोखी कला कृतियाँ हैं। वह ही मानव समाज के जीवन और संस्कृति के निर्वाहक भी हैं। उनके संदूषण, विनाश और विघटन को बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर लापरवाह शहरीकरण के कारण भारत में नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी को पहुँच रही क्षति को देखकर रोरिक बहुत चिंतित हुए होते|
इसलिए मुझे लगता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुद को रोरिक संधि की दृष्टि, लक्ष्य और कार्यों के प्रति फिर से समर्पित करना चाहिए|

प्रश्न: रोरिक परिवार की विरासत का बड़ा हिस्सा भारत में है। यह सर्वविदित है कि पिछले कई वर्षों में कुछ प्रतिकूल घटनाओं के कारण उनका काम प्रभावित हुआ है तथा नग्गर (कुल्लू घाटी) एवं बैंगलोर (कर्नाटक) में स्थित रोरिक मेमोरियल एस्टेट्स के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा है| भारत में रोरिक विरासत की रक्षा, संरक्षण और उसकी लोकप्रियता बढाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

उत्तर: मैं एक भारतीय की हैसियत से इस बात के लिए बहुत दुखी और शर्मिन्दा महसूस करता हूँ कि नग्गर (हिमाचल प्रदेश) और बैंगलोर (कर्नाटक) में रोरिक परिवार की अनमोल विरासत को ठीक से संरक्षित नहीं रखा गया है। इस विरासत को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी भारत सरकार और हिमाचल प्रदेश एवं कर्नाटक राज्यों की सरकारों की है| मेरे विचार में रोरिक समस्त दुनिया के एक नागरिक थे और उनका परिवार भारत और रूस के बीच दोस्ती के मजबूत बंधन का प्रतीक है, इसलिए भारत सरकार को गवर्निंग ट्रस्टों में उचित कानूनी और प्रशासनिक परिवर्तन लाकर नग्गर और बैंगलोर की कलात्मक संपत्तियों और सम्पदा का प्रत्यक्ष नियंत्रण अपने हाथों में लेना चाहिए ताकि नौकरशाही और स्थानीयता जैसी समस्याओं की कोई गुंजाइश न रह जाए| हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की राज्य सरकारों की भूमिका सीमित से अधिक नहीं होनी चाहिए। इन नई शासी निकायों में रूसी पक्ष का प्रतिनिधित्व अधिक मज़बूत किया जाना चाहिए। इस सिलसिले में निर्णय भारत सरकार द्वारा उच्चतम स्तर पर लिया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नग्गर और बैंगलोर स्थित रोरिक सम्पदाओं के मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्तिगत रुचि लेनी चाहिए।

एक बार यह हो जाता है तो समर्पित और जानकार व्यक्तियों को उचित अधिकार-पत्र और पर्याप्त बजट के साथ रोरिक की इन दोनों विरासतों की लोकप्रियता भारत और दुनिया भर में बढाने के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए| इन दोनों स्थलों को भारतीय और रूसी जानकारों के संयुक्त प्रबंधन वाले विश्व स्तरीय संस्कृति और कला केन्द्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए| बैंगलोर संपत्ति जो आकार में बहुत बड़ी है, न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क के स्तर का आकर्षण बनने की क्षमता रखती है। नग्गर में अंतर्राष्ट्रीय रोरिक कला संस्थान बनाने का प्रस्ताव है, जिसे कार्यान्वित किया जाना चाहिए| नई दिल्ली में एक रोरिक केंद्र खोला जाना चाहिए|

पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी (1998-2004) द्वारा रोरिक विरासत को पुनर्जीवित करने में व्यक्तिगत रुचि लेने के कारण इस दिशा में कुछ काम शुरू भी हुआ था| मैं उस समय पर प्रधानमंत्री कार्यालय में काम कर रहा था और मुझे इन प्रयासों के साथ जुड़े होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

इस संदर्भ में मैं पूर्ण कृतज्ञता और प्रशंसा के साथ नई दिल्ली में रूस के राजदूत श्री अलेक्सान्दर कदाकिन द्वारा भारत में रोरिक परिवार की अनमोल विरासत को लोकप्रिय बनाने और उसके संरक्षण के लिए किये जा रहे अथक और अतुलनीय प्रयासों का उल्लेख करना चाहूँगा|

प्रश्न: रोरिक परिवार ने रूस और भारत को करीब लाने के लिए काफी योगदान दिया| भारत-रूस संबंधों को बढ़ावा देने और द्विपक्षीय सहयोग के लिए नई संभावनाओं को खोलने में उनके विचारों और कार्यों की भूमिका के बारे में आपकी क्या राय है?

उत्तर: रोरिक परिवार ने भारत और रूस के बीच दोस्ती का एक अटूट बंधन स्थापित किया| हमारे दोनों देशों को इस परिवार की विरासत का एक साझा संपत्ति के रूप में तथा पूरी मानवता की एक परिसंपत्ति के रूप में संरक्षण करना चाहिए। ऐसा करते समय हमें प्रतीकों, दिखावटी प्रयासों और कर्मकांडों से परे रहना होगा। निकोलस रोरिक सिर्फ एक चित्रकार नहीं थे। वह निश्चित रूप से हिमालय की चोटियों की उत्कृष्टता प्रतिबिंबित करने वाले एक कलाकार थे, लेकिन वह कला, संस्कृति और जीवन के एक महान दार्शनिक भी थे| साथ ही उन्होंने अपने दर्शन को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास भी किया था, जिसका ज्वलंत उदाहरण रोरिक संधि और शांति का बैनर हैं और इनके तहत उन्होंने एक वैश्विक गतिविधि  शुरू की थी|

भारत और रूस — हमारे दोनों देशों की सरकारों और नागरिक समाजों – को राष्ट्रीय विकास के अपने मानदंड में इस दर्शन का पालन करने के प्रयास करना चाहिए। भारत और रूस दोनों को संयुक्त रूप से यूनेस्को और जी-20, ब्रिक्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों के सम्मुख यह प्रस्ताव रखना कि संस्कृति, कला और आध्यात्मिक परंपराओं को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण को सरकार की नीतियों और विकास एजेंडों की मुख्यधारा में शामिल किया जाए| 

हाल के वर्षों में सतत विकास पर वैश्विक बहस में एक नया सकारात्मक आयाम जोड़ा गया है। आज यह एक बढ़ती हुई मांग है कि संस्कृति को बढ़ावा देने और उसकी सुरक्षा को सतत विकास के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठापित किया जाए, इसके अन्य तीन स्तम्भ हैं:

• समावेशी सामाजिक विकास
• समावेशी आर्थिक विकास
• पर्यावरणीय स्थिरता


दुनिया भर में आज यह मांग भी है कि संयुक्त राष्ट्र के पोस्ट-2015 सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों में 'संस्कृति'  को भी शामिल किया जाए|

यह मांगें पूरी तरह से रोरिक संधि की दृष्टि को ध्यान में रखते हुए हैं, जिसके अनुसार सभी सुंदर, दिव्य, जीवन संजोये रखने वाली एवं विश्व को एकजुट करने वाली वस्तुओं का संरक्षण होना चाहिए और उन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए|
निकोलस रोरिक ने कहा था:

“सौंदर्य में हम एकजुट हैं!
सौंदर्य के माध्यम से हम प्रार्थना करते हैं!
सौंदर्य से हम जीत हासिल करते हैं!”


21 वीं सदी में अस्तित्व और प्रगति के वैश्विक एजेंडे में संस्कृति को फिर से केंद्र में समाहित करने के लिए लिए रोरिक संधि 20 वीं सदी का एक आह्वान है। भारत और रूस को इस आह्वान पर ध्यान देना चाहिए और हमारे दोनों देशों को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इसके प्रति जागरूक करने के प्रयास करने चाहिए|

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