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रूसी-भारतीय सम्बन्धों का भविष्य आधुनिक तक्नोलौजियों में है, न कि चालाकी भरे टैण्डरों में।

Thursday, 15 August 2013 11:58

भारत में रूस के राजदूत अलेक्सान्दर कदाकिन को विश्वास है कि रूसी-भारतीय सम्बन्धों का भविष्य आधुनिक तक्नोलौजियों और सँयुक्त रूप से मिलकर किए जा रहे उनके उत्पादन में है, न कि चालाकी भरे टैण्डरों में। भारत के स्वतन्त्रता दिवस की पूर्ववेला में अलेक्सान्दर कदाकिन ने 'रेडियो रूस' के सवालों के उत्तर दिए।

मेंआपकीगतिविधियाँभारतसेसम्बन्धितरहीहैं।रूसीभारतीयरिश्तेकीख़ासियतक्या है? क्याआपसंक्षेपमेंउनकुछप्रमुखघटनाओंकेबारेमेंबताएंगे, जिनमेंआपनेभी हिस्सेदारीकीहो।

राजदूतकदाकिन : भारत के स्वतन्त्रता दिवस की पूर्ववेला में, सभी भारतीयों के लिए इस पवित्र दिन के अवसर पर, जब 15 अगस्त के दिन जवाहरलाल नेहरू ने लालकिले पर विशाल और स्वतन्त्र भारत का तिरंगा झण्डा लहराया था, मैं रूस के बड़े और गहरे मित्र इस प्राचीन देश के एक अरब बीस करोड़ निवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। राजनयिक के रूप में काम करते हुए मेरे लिए जो घटना चिरस्मरणीय रहेगी वह घटना है -- भारत के साथ रणनीतिक सहयोग का घोषणापत्र, जिसपर हमारे राष्ट्रपति पूतिन ने अक्तूबर, 2000 में हस्ताक्षर किए थे, जब मैं पहली बार भारत में रूस का राजदूत बना था। आज यह घोषणापत्र वह मूल दस्तावेज़ है, जिसपर हमारे दो देशों के बीच आपसी सम्बन्ध आधारित हैं। यह घोषणापत्र अन्तरराष्ट्रीय राजनयिक क्षेत्रों में एक महत्त्वपूर्ण और अभूतपूर्व घटना बन गया था। यह दो देशों के बीच राजनयिक सम्बन्धों का एक नया रूप सामने लेकर आया था, जिसको रणनीतिक सम्बन्ध के नाम से पुकारा गया यानी अनेक दशकों के लिए एक-दूसरे पर पूरा-पूरा विश्वास।

इस पर हस्ताक्षर होने के पूरे दस साल बाद वर्ष 2000 के इस घोषणापत्र के आधार पर दोनों पक्षों ने अपने सहयोग को दो देशों के बीच 'विशेष प्राथमिकता के आधार पर रणनीतिक सहयोग' का नाम दिया। इन सभी घटनाओं में मैंने भी पूरा-पूरा भाग लिया था। लेकिन मुझे 9 अगस्त 1971 का दिन भी ख़ूब याद आता है, जब मैं पहली बार एक प्रशिक्षु राजनयिक के रूप में भारत आया था। उस दिन भी शान्ति, मैत्री और सहयोग के बारे में ऐतिहासिक सोवियत-भारतीय सन्धि पर हस्ताक्षर किए गए थे। भारत में रूस के राजदूत अलेक्सान्दर कदाकिन ने आगे कहा -- हमारे रिश्तों में बड़े स्तर पर जो खुलापन, जो विश्वास, जो आपसी समझ और जो सच्ची मैत्री दिखाई देती है, वही सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है।

रेडियोरूस : हमारेदोदेशोंकेबीचआपसीसम्बन्धोंकेविकासमें तीव्रगतिकेबावजूदपिछलेसमयमेंकुछदिशाओंमेंकुछजटिलताएँभीदिखाईदेरही हैं।जैसेहमारेबीचव्यापारकाविकासतेज़गतिसेनहींहोरहाहैतथाएक-दूसरेके यहाँनिवेशकीगतिभीबहुतधीमीहै।भारतीयबाज़ारमेंकामकरनेवालीरूसी कम्पनियाँ 'रोसएटम', 'सिस्टेमा', तथा'कमाज़' कोभीवहाँमुश्किलोंकासामनाकरना पड़रहाहै।रक्षाक्षेत्रमेंहमारेदोदेशोंकेबीचजोसहयोगहोरहाथा, उसमेंभी बदलावआयाहै।क्यायेबदलावऔरयेमुश्किलकिसीविशेषप्रवृत्तिकीसूचकनहीं हैं?

राजदूतकदाकिन : मुझे लगता है कि परिस्थिति का निराशाजनक मूल्यांकन करने की ज़रूरत नहीं है। सैन्य-तकनीक के क्षेत्र में हमारे दो देशों के बीच जो सहयोग हो रहा है, उस पर मिट्टी डालने का समय अभी नहीं आया है। निश्चय ही, जो लोग वास्तव में काम कर रहे हैं, उनके सामने समय-समय पर समस्याएँ उभरती हैं, लेकिन वे समस्याएँ तो विकास से ही जुड़ी हुई हैं। ये सब मिथ्या वादी, बेकार के आरोप लगाने वाले शहद के डिब्बे में तारकोल का चम्मच डालने की कोशिश कर रहे हैं और रूस को एक-दो टेण्डर न मिलने पर बेकार का रुदन कर रहे हैं और बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। टेण्डर क्या होता है? टेण्डर का मतलब है -- ख़रीददार और विक्रेता के बीच रिश्ता। यह रिश्ता अपनी पूरी सकारात्मकता और पारदर्शिता के बावजूद ख़राब भी हो सकता है। इसलिए मुझे टेण्डर पसन्द नहीं हैं। हम भारत को सबसे आधुनिक तक्नोलौजी दे रहे हैं। इनमें सैन्य तकनोलौजी भी शामिल है। मेरे लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत को किस टेण्डर के अन्तर्गत विक्रमादित्य जैसा विमानवाहक पोत मिला होता? जो जल्दी ही भारत के लिए रवाना हो जाएगा।

ज़रा बताइए कि किस टेण्डर के अन्तर्गत दुनिया के किसी भी देश ने भारत को एवियेशन तकनीक के उत्पादन की तक्नोलौजी दी होती और वह भी सबसे आधुनिक तक्नोलौजी? हमारे सम्बन्धों का भविष्य, हमारे रिश्तों का भविष्य इन्हीं बातों पर आधारित है, न कि टेण्डरों पर, जिनके महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित किया जाता है। ज़रा दुनिया के उस बेहतरीन क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' के सँयुक्त रूप से किए जा रहे उत्पादन की तरफ़ भी ध्यान दीजिए। ये मिसाइल पानी के भीतर से भी मार कर सकते हैं, पानी के बाहर से भी। ये मिसाइल पृथ्वी पर भी तैनात किए जा सकते हैं और अगले साल तक इन्हें लड़ाकू हवाई जहाज़ों में भी तैनात करने की बात की जा रही है। टेण्डर अपनी जगह पर हैं, लेकिन दुनिया के किसी भी देश ने भारत को अपने गुप्त रहस्य, अपनी गुप्त तकनोलौजियाँ नहीं दी हैं। देखिए, रफ़ाएल विमानों को लेकर भी समस्या उठ खड़ी हुई है और सवाल वही तकनोलौजी के लेन-देन का है। कृपया मुझे रूस के अलावा एक भी ऐसा देश बताइए, जिसने भारत को वास्तव में कोई तकनोलौजी दी हो। ऐसा कोई देश नहीं है। इसी में भारत के साथ हमारे सैन्य-तकनीकी सहयोग की विशेषता जाहिर होती है। दूसरे देशों के साथ भारत इस स्तर पर सैन्य तकनीकी सहयोग नहीं कर रहा है।

हम भारत को लगातार विकसित होते हुए, लगातार ताकतवर होते हुए देखना चाहते हैं। हम सैन्य क्षेत्र में भी भारत का विकास चाहते हैं। इसीलिए पिछले 50 साल में हमने भारत से अपना वह सब कुछ बाँटा, जिसे हम बाँट सकते थे। हम आज भी भारत के साथ काम कर रहे हैं और हमें विश्वास है कि आगे भी हम चलेंगे साथ-साथ, डाल हाथों में हाथ।

पिछले दौर में अर्थिक क्षेत्र में, व्यापार के क्षेत्र में भी कुछ ऐसी गतिविधियाँ हो रही हैं, जिनसे आगे बढ़ने की आशा बँधती है। हमारे दो देशों के बीच कुल व्यापार ग्यारह अरब डॉलर से ज़्यादा हो गया है। हमारे दो देशों के नेताओं ने, राष्ट्रपति पूतिन ने और प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने यह उद्देश्य उठाया है कि दो देशों के बीच व्यापार को बढ़ाकर सन् 2015 तक 20 अरब डॉलर तक पहुँचाया जाए। आज की परिस्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि हम यह उद्देश्य प्राप्त कर लेंगे।

रेडियोरूस :दुपक्षीयसम्बन्धोंकाविश्लेषणकरकेतथानिकटभविष्य मेंउनकेविकासकाअनुमानलगातेहुए, आपकोक्यालगताहै, हमारेसहयोगकीकौनसी दिशाएँऐसीहैं, जिन्हेंप्राथमिकतादीजाएगी?

राजदूतकदाकिन : सबसे पहले तो नागरिक एटमी ऊर्जा के क्षेत्र में हमारे सहयोग का बड़े स्तर पर विकास होगा। भारतीय वैज्ञानिकों ने गणना की है कि सन् 2030 तक भारत यदि सारी दुनिया में उत्पादित सारा तेल भी ख़रीदेगा तो वह भी उसके तेज़ी से हो रहे विकास के लिए पूरा नहीं पड़ेगा। इसलिए प्रधानमन्त्री नेहरू द्वारा एटमी ऊर्जा क्षेत्र की जो नींव भारत में रखी गई थी, उसकी भारत को बेहद ज़रूरत है। सोच-विचार करने वाले सभी भारतीय इस बात को अच्छी तरह समझते हैं। लेकिन चालाक एन०जी०ओ० संगठन, जो पश्चिमी विदेशी सहायता पा रहे हैं, भारत में एटमी ऊर्जा का विरोध करते हैं।। लेकिन ये एन०जी०ओ० संगठन हमारे उन प्रतिद्वन्द्वियों के लिए काम कर रहे हैं, जो इस काम को ख़ुद पाना चाहते हैं। ख़ुशी की बात यह है कि हम अपने इन प्रतिद्वन्द्वियों से कहीं आगे-आगे चल रहे हैं। कुडनकुलम बिजलीघर का पहला यूनिट शुरु किया जा चुका है, दूसरा यूनिट शुरू करने में कुछ देर हो रही है। लेकिन इससे क्या? हम आख़िर इस बाज़ार में सबसे पहले घुसे हैं। हमें जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है। शान्तिपूर्ण एटम के क्षेत्र में काम करने के और सहयोग करने के हमारे रोडमैप पर पहले ही हस्ताक्षर हो चुके हैं। हमें इसी रोडमैप पर आगे बढ़ना है और काम करना है। चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, हमें इसी रास्ते पर आगे बढ़ना है। मुश्किलें तो आती ही रहती हैं, आ भी रही हैं, भारत ने नागरिक ज़िम्मेदारी का जो घरेलू कानून स्वीकार किया है, वह काल्पनिक नुक़सान पर आधारित है। लेकिन हम फिर भी रोडमैप के आधार पर अपना काम कर रहे हैं, जिसमें भारत के लिए 16 एटमी बिजलीघरों को बनाने की बात की गई है।

विमानवाहक युद्धपोत 'विक्रमादित्य' को लेकर भी समस्याएँ सामने आईं। अगर आप यह चाहते हैं कि बच्चा स्वस्थ रहे तो उसका अपने समय पर पैदा होना ज़रूरी है। विमानवाहक युद्धपोत जैसे बड़े जहाज़ को हमने भारत के लिए नए सिरे से फिर बनाकर खड़ा कर दिया है। यह हमारे दो देशों के बीच सहयोग का एक नया अनुभव रहा है। हालाँकि इसको भारत को सौंपने में भी कुछ देर-सवेर हो सकती है।

रेडियोरूस :आइए, दूसरेविषयकोलें।सबजानतेहैंकिरेरिख़परिवारनेरूसऔरभारतकेबीचसम्पर्कोंऔरसम्बन्धोंकोकाफ़ीआगेबढ़ाया।चित्रकारोंऔर दार्शनिकोंकेइसपरिवारकेसदस्योंनेभारतकोअपनीदूसरीमातृभूमिमान लियाथा।औरआपअलेक्सान्दरमिखाइलाविच, इसपरिवारकेअन्तिमसदस्यस्वितास्लाव रेरिख़कीइच्छासेअन्तरराष्ट्रीयरेरिख़मेमोरियलट्रस्टकेआजीवनसदस्यबनेथे।आपकोइसट्रस्टकीगतिविधियोंकीआगेक्यासम्भावनाएँदिखाईदेती हैं?

राजदूतकदाकिन : अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ मेमोरियल ट्रस्ट के भारतीय और रूसी सदस्यों के बीच पिछले समय में कुछ तनाव और मतभेद दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इस तरह की चीज़ें अस्थाई होती हैं। यह मतभेद और तनाव भी दूर हो जाएँगे। इस समय मास्को स्थित अन्तरराष्ट्रीय रेरिख़ केन्द्र ने कुल्लू घाटी में, नग्गर में विश्व स्तरीय एक बड़े संग्रहालय का निर्माण करने की एक विशाल परियोजना तैयार की है। यह जगह भी भारत की स्वतन्त्रता से सीधे-सीधे जुड़ी हुई है, जिसे हम इन दिनों मनाने जा रहे हैं। यही पर 1942 में, जब सारी दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत से काँप उठी थी, जवाहरलाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी के साथ आए थे। तब वे रेरिख़ के घर में रहे थे। तब भारत की आज़ादी में सिर्फ़ पाँच बरस बाक़ी रह गए थे। तभी उन्होंने भारत और रूस के बीच साँस्कृतिक सहयोग पर बात की थी। इसलिए यह जगह वास्तव में बड़ी पवित्र जगह है।

हमारे दो देशों के बीच आपसी सम्बन्धों में इस जगह के बड़े महत्त्व को देखते हुए, इसके अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व को स्वीकारते हुए, यह बेहद ज़रूरी है कि यह जगह सिर्फ़ स्थानीय प्रशासन के हाथों में न रहे, बल्कि राज्य प्रशासन के हाथों में भी न रहकर इसे सीधे केन्द्र सरकार के अन्तर्गत लाना चाहिए, जिसमें हिमाचल प्रदेश की सरकार भी सहयोग करती रहे। मेरा ख़याल है कि हिमाचल प्रदेश में काँग्रेस की सरकार बनने के बाद और वीर बहादुर सिंह के मुख्यमन्त्री बनने के बाद यहाँ भी सब कुछ ठीक हो जाएगा। इस समय तो सबसे ज़रूरी यह है कि यहाँ पर अन्तरराष्ट्रीय और विश्व स्तरीय एक बड़े संग्रहालय का निर्माण करने की मास्को के रेरिख़ केन्द्र की विशाल परियोजना पर अमल किया जाए।

रेडियोरूस : पिछले70 सालसेरेडियोरूसभारतकेअपनेश्रोताओंको रूसमेंघटनेवालीघटनाओंकाविस्तारसेपरिचयदेरहाहैऔररूसी-भारतीयसम्बन्धों केविकासकेसभीदौरोंसेभारतीयश्रोताओंकोपरिचितकरारहाहै।रूसऔरभारतकेबीचसम्बन्धोंकेनिर्माणमेंसीधे-सीधेभागलेनेकेलिएऔरभारतकेस्वतन्त्रतादिवसपरहमारेकार्यक्रममेंभागलेनेकेलिएहमआपकेआभारीहैं।हमेंप्रसन्नता हैकिआपरेडियोरूसकेश्रोताक्लबकेसंरक्षकऔरअध्यक्षभीहैं।

राजदूतकदाकिन : शायद आपको याद हो कि मैं रेडियो रूस के श्रोता क्लब का एक सदस्य भी हूँ। आपका रेडियो स्टेशन हमारे दो देशों के बीच मैत्री को बढ़ावा देने के लिए बहुत अच्छा काम कर रहा है। इसके लिए मैं रेडियो रूस की सेवाओ का प्रशंसक हूँ और आभारी भी हूँ। मुझे मालूम है कि आजकल रेडियो रूस अपने श्रोताओं के लिए डिजिटल प्रसारण कर रहा है। उसने उनके लिए भारत में एफ़०एम० प्रसारण भी शुरु किया है। भारत की आज़ादी के दिन की इस पूर्ववेला में मैं रेडियो रूस के सभी श्रोताओं को और अपने सभी भारतीय मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और उनके सभी कामों में उनके लिए हृदय से सफलता की कामना करता हूँ। और मैं उनसे कहना चाहता हूँ -- दोस्तों, हम सदा आपके साथ थे, हम सदा साथ हैं और हम सदा आपके साथ रहेंगे।

Natalia Benyukh, The Voice of Russia

Aug 15, 2013

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