रूस और भारत के बीच अनूठे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध

Friday, 14 August 2015 18:24

15 अगस्त को भारत में स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर भारत में रूस के राजदूत अलेक्सान्दर कदाकिन ने संवाद समिति स्पूतनिक की विशेष संवाददाता नताल्या बेन्यूख़ को इण्टरव्यू दिया। प्रस्तुत है वह इण्टरव्यू।

नताल्या बेन्यूख़ -- आपके लिए भारत के स्वतन्त्रता दिवस का क्या महत्त्व है? इस अवसर पर आप अपने भारतीय दोस्तों और सहयोगियों से क्या कहना चाहेंगे?
अलेक्सान्दर कदाकिन -- भारत का स्वतन्त्रता दिवस मेरे लिए और मेरे सहयोगियों के लिए न्याय की विजय का प्रतीक है, यह दिवस भारतीय नागरिकों की अनेक पीढ़ियों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतीक है। भारतीय जनता ने उपनिवेशवादियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न का दशकों तक  डटकर विरोध किया और उसके बाद ही ख़ुद अपने भाग्य का निर्णय करने का  अधिकार पाया। आज़ादी पाने के बाद भारत नवनिर्माण की नई  और लम्बी कठिन राह पर आगे बढ़ने लगा।  इस राह पर आगे बढ़ते हुए आज भारत तेज़ी से विकास कर रही एक ऐसी अर्थव्यवस्था बन गया है, जिसे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी प्रतिष्ठा मिली हुई है और जिसे आज की दुनिया में एक उभरती हुई महाशक्ति माना जा रहा है।
पिछले 68 सालों से भारत और रूस एक-दूसरे के दोस्त है। हमें इस बात पर गर्व है कि भारत के साथ हमारे राजनयिक रिश्ते भारत को औपचारिक तौर पर आज़ादी मिलने से कुछ महीने पहले ही स्थापित हो गए थे। बीते वर्षों में भारत मे हुए गहरे आन्तरिक राजनीतिक परिवर्तनों और दुनिया में हुए क्रान्तिकारी बदलावों के बावजूद रूसी भारतीय मैत्री प्रगाढ़ होती चली गई। आज हमारे दो देशों के सम्बन्धों को विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक सम्बन्ध माना जाता है। ये रिश्ते अद्वितीय अन्तरराष्ट्रीय प्रारूप रखते हैं और कूटनीति के इतिहास में भी अनुपम माने जाते हैं।
मेरे निजी जीवन में भी भारत की आज़ादी का यह दिन बड़ा महत्त्व रखता है। 1971 में भारत के स्वतन्त्रता दिवस की पूर्ववेला में ही मैं पहले-पहल भारत पहुँचा था। वह 9 अगस्त का दिन था, जब मेरे क़दम भारत में पड़े थे। यह वही दिन था, जब शान्ति, मैत्री और सहयोग के बारे में सोवियत-भारतीय सन्धि पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसने आने वाले दशकों के लिए हमारे दो देशों के रिश्तों को और गहरा किया। मुझे लगता है कि यह भी मेरे लिए भाग्य का एक संकेत था, क्योंकि उन्हीं यादगार दिनों के बाद भारत मेरे जीवन का एक अपरिहार्य अंश बन गया। अपने राजनयिक जीवन के पच्चीस साल मैंने यहीं, इसी भारत-भूमि पर बिताए हैं।
इसीलिए मुझे लगता है कि भारत का स्वतन्त्रता दिवस मेरा अपना त्यौहार भी है। इस अवसर पर अपने भारतीय मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए मैं पूरे दिल से यह कामना करता हूँ कि महान भारत के विकास और समृद्धि के लिए तथा हमारी मैत्री को सुदृढ़ बनाने के लिए किया जा रहा हर काम सफल हो और भारत नित नई सफलताएँ प्राप्त करे।

नताल्या बेन्यूख़ -- रूस और भारत के बीच रणनीतिक सहयोग का विकास किस रूप में और कैसे हो रहा है?
अलेक्सान्दर कदाकिन -- संवाद समिति  ’स्पूतनिक’ के पाठकों को मैं सबसे पहले तो यह बताना चाहता हूँ कि 21 वीं शताब्दी की दहलीज़ पर रूस और भारत ने सन 2000 में व्लदीमिर पूतिन और अटलबिहारी वाजपेयी  द्वारा हस्ताक्षरित ’रणनीतिक सहयोग सन्धि करके’ एक नई पहल की थी। बाद में ’रणनीतिक सहयोग’ नामक इस परिभाषिक शब्द का  अन्तररष्ट्रीय राजनीति में ख़ूब उपयोग किया जाने लगा। हमारे सम्बन्ध परिपक्वता, विविधता और गहराई का प्रतीक बन गए हैं। आज जब दुनिया में भारी उथल-पुथल हो रही है, हमारे रिश्ते और मजबूत होते जा रहे हैं। हमारे बीच अभूतपूर्व रूप से आपसी समझ और पारस्परिक विश्वास पैदा हो गया है। आर्थिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में, घरेलू और विदेश नीति में, शान्ति और सुरक्षा के क्षेत्र में तथा नए वैश्विक ढाँचे के निर्माण को लेकर हमारी प्राथमिकताएँ बिल्कुल एक जैसी हैं। स्वतंत्र भारत के अस्तित्व के आरम्भिक दिनों से ही हमारी सँयुक्त कोशिशों के फलस्वरूप हमें जो अमूल्य उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं, उनके आधार पर आज हमारे दोनों देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को और दुनिया की सामयिक स्थिति को देखते हुए दुपक्षीय सहयोग की नई दिशाओं में क़दम बढ़ा रहे हैं।

नताल्या बेन्यूख़ -- लम्बे समय से रूस और भारत अपने दुपक्षीय व्यापारिक-आर्थिक रिश्तों को गति प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन प्रगति बहुत कम हो रही है। इसके क्या कारण हैं? तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए और क्या किया जा रहा है? क्या कुडनकुलम एटमी बिजलीघर के अलावा आजकल किन्हीं और ठोस योजनाओं पर भी अमल किया जा रहा है?
अलेक्सान्दर कदाकिन -- हमारे दो देशों के बीच परस्पर आर्थिक सहयोग रूसी भारतीय रणनीतिक सहयोग का एक आधारभूत और महत्त्वपूर्ण कारक है। निकट भविष्य में एटमी ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग इसकी मुख्य दिशा बन जाएगा। 2015 के इस साल के आख़िर तक कुडनकुलम एटमी बिजलीघर का दूसरा यूनिट भी शुरू हो जाएगा। हमें आशा है कि सन 2016 के शुरू में हम कुडनकुलम में तीसरा और चौथा यूनिट भी बनाना शुरू कर देंगे। भारत कुछ और जगहों पर नए परमाणु बिजलीघरों का निर्माण करने के लिए रूस को अनुबन्ध देने की तैयारी कर रहा है। दिसम्बर--2014 में हुई शिखर मुलाक़ात के दौरान दो देशों के बीच परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में आपसी सहयोग के बारे में हस्ताक्षरित समझौते में जो ’रणनीतिक दृष्टि’ तय की गई है, उसके अनुसार रेडियो-इज़ाटोपों के उत्पादन और वैज्ञानिक-तकनीकी आविष्कारों सहित विभिन्न दिशाओं में पारस्परिक सहयोग का विकास किया जाएगा।
मैं आपकी यह बात मानता हूँ कि रूस और भारत जैसी विशाल विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी व्यापार के विकास की अभी भी बहुत सी सम्भावनाएँ बाक़ी हैं। यहाँ इस बात की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि बीते कुछ वर्षों में हमने लघु और मध्यम दरजे के व्यावसायिक सम्पर्कों के क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है। रूस के विभिन्न प्रदेश इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़े हैं। हमारे दोनों ही देशों में और अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक दृष्टि से भी औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए व पारस्परिक रूप से निवेश करने के लिए  वातावरण बेहतर हुआ है।
पिछले साल दिसम्बर में हमारे दो देशों के नेताओं ने आपसी मुलाक़ात के समय दो देशों के बीच व्यापार को सन 2025 तक बढ़ाकर 30 अरब डॉलर तक पहुँचाने और पारस्परिक निवेश का स्तर भी 15 अरब डॉलर करने का जो लक्ष्य उठाया है, उसे सचमुच पाया जा सकता है। आपसी हिसाब-किताब में राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल करने की व्यवस्था भी बनाई जा रही है। ’उत्तर-दक्षिण’ नामक अन्तरराष्ट्रीय परिवहन कॉरीडोर के निर्माण पर भी बड़ी तेज़ी से काम चल रहा है। इस परिवहन गलियारे के चालू होने के बाद रूस और भारत के बीच मालों का आवागमन बेहद सहज और सुगम हो जाएगा। रूस और भारत के बीच मालों के आदान-प्रदान में आज के मुकाबले बहुत कम समय लगेगा और उनके परिवहन का खर्च भी कम पड़ेगा। यूरेशियाई आर्थिक संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार क्षेत्रों का निर्माण करने के बारे में भी बातचीत चल रही है। हाल ही में उस सँयुक्त शोध-दल की बैठक हुई थी, जो मुक्त व्यापार क्षेत्रों के निर्माण के बारे में समझौते के औचित्य का अध्ययन कर रहा है। पारस्परिक निवेशों की सुरक्षा करने और उनका विकास करने से जुड़े समझौते का नवीनीकरण करने की दिशा में भी काम जारी है। इन सब क़दमों से न सिर्फ़ दुपक्षीय आधार पर बल्कि प्रादेशिक आधार पर भी फलप्रद सहयोग करने के लिए नया वातावरण पैदा हो रहा है।
दुपक्षीय व्यापारिक-आर्थिक सम्पर्कों के क्षेत्र में प्रगति की बात करते हुए तेल और गैस के क्षेत्र में कुछ परियोजनाओं में किए जा रहे सफल काम का भी ज़िक्र करना चाहिए। भारतीय कम्पनी ओ० एन० जी०सी० विदेश लिमिटेड रूस के तोमस्क प्रदेश में और सख़ालिन द्वीप के उत्तर-पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र में सख़ालिन-1 नामक परियोजना के अन्तर्गत तेल के कुओं  की खुदाई कर रही है। रूस के राष्ट्रपति द्वारा पिछले वर्ष के दिसम्बर महीने में की गई भारत-यात्रा के दौरान जो सहमतियाँ हुई थीं, उन्हीं सहमतियों को और आगे बढ़ाते हुए विगत 8 जुलाई को ऊफ़ा में सम्पन्न ब्रिक्स शिखर-सम्मेलन के दौरान रूसी कम्पनी ’रोसनेफ़्त’ और भारतीय कम्पनी ’ऐस्सार’ ने तेल की आपूर्त्ति के एक दीर्घकालीन समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस तेल का इस्तेमाल भारत के वदीनार तेलशोधन कारख़ाने में किया जाएगा। इस समझौते के अनुसार, रूसी कम्पनी ’रोसनेफ़्त’ भारतीय कम्पनी ’एस्सार’ को आने वाले दस सालों के अन्दर कुल दस करोड़ टन कच्चे तेल की आपूर्त्ति करेगी। गैस और तेल के क्षेत्र में भारत और रूस के बीच सहयोग के इतिहास में यह सचमुच एक उल्लेखनीय घटना है, जो सम्बन्धित क्षेत्रों में सहयोग के लिए व्यापक सम्भावनाओं के द्वार खोलती है।
इसके अलावा रोसनेफ़्त कम्पनी  एस्सार के वदीनार तेलशोधन कारख़ाने में 49 प्रतिशत की पार्टनर भी बन जाएगी। इस सौदे के अनुसार,  दोनों देशों की ये दोनों कम्पनियाँ मिलकर भारत में 1600 पैट्रोल-पम्पों का एक नेटवर्क भी स्थापित करेंगी।
इसके अतिरिक्त ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाते हुए मार्च 2014 में  भारत के ’हाइड्रोप्रोजेक्ट इंस्टीट्यूट’ और ’रूस हाइड्रो इण्टरनेशनल’ नामक कम्पनी ने भारत के सबसे बड़े ऊपरसेंग पनबिजलीघर के दूसरे चरण का डिजाइन बनाने के लिए भी एक अनुबन्ध किया था।  इसी साल फ़रवरी में रूसी कम्पनी ’स्वेताविए तेख़नालोगी ने कर्नाटक राज्य के जिगानी शहर की सड़कों पर लगे बिजली के खम्भों के लिए प्रतिमाह 60 हज़ार  विशेष क़िस्म के बल्बों का उत्पादन करना शुरू कर दिया है। ऐसे और भी उदाहरण हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि कि दो देशों के व्यावसायिक क्षेत्र पारस्परिक रूप से लाभप्रद सहयोग का विस्तार करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।

नताल्या बेन्यूख़ -- सैन्य-तकनीकी सहयोग रूसी भारतीय दुपक्षीय रिश्तों में बड़ा भारी महत्त्व रखता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से फ़्राँस, इज़रायल और अमरीका जैसे कुछ देश भारतीय बाज़ार में रूस को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। रूस और भारत के बीच इस सहयोग का आप कैसा मूल्यांकन करते हैं और इस सहयोग के विकास की क्या सम्भावनाएँ देखते हैं? दो देशों के बीच सैन्य-तकनीकी सहयोग का विकास आगे किन दिशाओं में होगा?
अलेक्सान्दर कदाकिन -- मेरा ख़याल है कि यह कहना बेमानी है कि रूस भारत के हथियारों के बाज़ार को गवाँ चुका है। यह बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही जा रही बात है। भारत को हथियारों की सीधी सप्लाई करने और भारत में ही भारत के साथ मिलकर सँयुक्त रूप से विभिन्न प्रकार के हथियारों का उत्पादन करने वाला रूस आज भी भारत का एक प्रमुख सहयोगी देश है। भारतीय नौसेना आज 80 प्रतिशत तक रूसी उपकरणों और रूसी हथियारों से लैस है, जबकि भारतीय वायुसेना में भी 70 प्रतिशत हथियार  और उपकरण रूस में उत्पादित हैं। दुनिया के किसी भी दूसरे देश के साथ भारत इतने विशाल स्तर पर सहयोग नहीं करता है।
इस क्षेत्र में सहयोग का मुख्य आधार सन 2011 से 2020 तक सैन्य तकनीकी क्षेत्र में सहयोग के बारे में बनाया गया कार्यक्रम और दो देशों के बीच हुए 20 अन्तरसरकारी समझौते हैं। ये समझौते 35 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के हैं। भारत ने इतने बड़े सहयोग-समझौते दुनिया के किसी भी दूसरे देश के साथ नहीं किए हैं।
भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के कार्यक्रम में यह सुनिश्चित किया गया है कि भारत विदेशों से बीसियों करोड़ डॉलर के आधुनिक और नवीनतम हथियार ख़रीदेगा। और रूसी हथियारों को भारत प्राथमिकता दे रहा है। इस क्षेत्र में रूसी भारतीय सहयोग पूरी तरह से आपसी विश्वास पर आधारित है और पूरी तरह से गुप्त है। इस दिशा में दो देशों के बीच आपसी सहयोग का मूल्यांकन भावी योजनाओं या पारस्परिक रूप से किए गए अनुबन्धों के आधार पर नहीं, बल्कि उन सँयुक्त परियोजनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए, जिन पर इन दिनों अमल किया जा रहा है और जो भविष्य में पूरी होंगी। जैसे सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस की बात की जानी चाहिए, जिसे भारतीय सेना में शामिल कर लिया गया है और जिसे भारतीय सेना के सभी अंगों में इस्तेमाल किए जाने के लिए बनाया जा रहा है, चाहे वह थलसेना हो, वायुसेना हो या नौसेना। इसके अलावा रूस और भारत द्वारा मिलकर बनाए जा रहे पाँचवी पीढ़ी के बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान की भी चर्चा की जा सकती है। इसके अतिरिक्त ऐसी और भी अनेक सम्भावनाशील परियोजनाएँ हैं।
रूस भारत को सहज ही अपनी टेक्नोलौजी देने को तैयार है और वह भारत के साथ मिलकर फ़ौजी मालों का उत्पादन करना चाहता है। भारत के प्रधानमन्त्री द्वारा शुरू किया गया ’मेक इन इण्डिया’ अभियान रूसी और भारतीय कम्पनियों के बीच आपसी सहयोग की बड़ी सम्भावाअएँ पेश करता है। इस अभियान के अन्तर्गत रूस भारत में उन क्षेत्रों में भारत के साथ मिलकर सँयुक्त उपक्रमों का निर्माण करेगा, सैन्य-तकनीकी सहयोग और नागरिक सहयोग के जिन क्षेत्रों में दो देशों के बीच पहले से ही पारम्परिक रूप से सम्पर्क बने रहे हैं। बात मध्यम दर्जे के बहुउद्देशीय परिवहन विमान, पाँचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान तथा एम०एस-21 विमान के लिए विभिन्न हिस्सों और पुर्जों के  उत्पादन में सहयोग की हो रही है।
हम भारत के साथ मिलकर आधुनिकतम के०ए० -- 226 हैलिकॉप्टर का उत्पादन करना चाहते हैं। इसके अलावा युद्धपोतों, पनडुब्बियों, आधुनिकतम टैंकों और भारत की दिलचस्पी के अन्य हथियारों और फ़ौजी मालों का भारत में सँयुक्त रूप से उत्पादन करने के बारे में भी बातचीत चल रही है। भारत में सँयुक्त कम्पनियाँ बनाने के लिए रूस भारत की सरकारी कम्पनियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र की प्रमुख कम्पनियों के साथ सहयोग करने को तैयार है।  

नताल्या बेन्यूख़ -- भारत और रूस के बीच दशकों से वैज्ञानिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों का विकास होता रहा है। हम छात्रों, विद्वानों और विशेषज्ञों का आदान-प्रदान करते रहे हैं। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद हमारे सांस्कृतिक सम्बन्ध टूटे हुए नज़र आ रहे हैं। हालाँकि हमारे राजनीतिक रिश्तों को  ’विशेष प्राथमिकता प्राप्त रणनीतिक सहयोग सम्बन्ध’  कहकर पुकारा जाता है, लेकिन मुझे लगता है कि वैज्ञानिक-सांस्कृतिक, शैक्षिक और सूचनात्मक आदान-प्रदान के क्षेत्र में हमारे रिश्ते पुराने सोवियत स्तर तक अभी भी नहीं पहुँच पाए हैं। रूस और भारत के बीच सांस्कृतिक सम्पर्कों के विकास की आज क्या सम्भावनाएँ हैं? क्या दुपक्षीय पर्यटन का विकास होगा?
अलेक्सान्दर कदाकिन -- रूस और भारत के बीच मानवीय सहयोग का विकास अन्तरसरकारी सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अन्तर्गत हो रहा है। सच-सच कहूँ तो पिछले कुछ वर्षों में रूस और भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन के क्षेत्र में बहुत ज़्यादा प्रगति करना सम्भव हुआ है। भारतीय संगीतप्रेमियों, नृत्यप्रेमियों, नाटकप्रेमियों और कलाप्रेमियों को अब अक्सर रूसी कला मण्डलियों से साक्षात्कार करने का मौक़ा मिलता है। सन 2014 में नई दिल्ली में और भारत के पाँच अन्य नगरों में व्यापक स्तर पर रूसी संस्कृति महोत्सव मनाया गया। इस अवसर पर मास्को राजकीय अकादेमिक नृत्य थियेटर ’ग्झेल’, बरोदिन मास्को राजकीय शैक्षिक रंगमंच, अब्रज़्त्सोवा कठपुतली थियेटर, नवासिबीर्स्क बैले और ओपेरा ट्रुप जैसी मण्डलियों के कलाकारों ने भारत में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। भारत में रूस महोत्सव के दौरान आयोजित सांस्कृतिक सन्ध्याओं के दौरान हॉल दर्शकों और श्रोताओं से खचाखच भरे रहते थे। पिछले साल रूस महोत्सव को भारत की अप्रतिम सांस्कृतिक घटना माना गया।
भारत में रूसी दूतावास और रूसी सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद ’रोससत्रूदनिचिस्त्वा’ द्वारा भारत के विभिन्न नगरों में आयोजित सांस्कृतिक संध्याओं में रूसी कला मण्डलियाँ बड़े उत्साह से भाग लेती रही हैं। नई दिल्ली और मुम्बई में रूसी पियानोवादक और ’यूनेस्को के विश्वस्तरीय कलाकार’  सिर्गेय मरकारफ़ ने अपना पियानोवादन प्रस्तुत किया। विगत अक्तूबर में नई दिल्ली में, हिमाचलप्रदेश के नग्गर और कुल्लू में, मुम्बई में, पूणे में और त्रिवेन्द्रम में रूस के समारा नगर की प्रसिद्ध नृत्यमण्डली ’इस्कोरकी’ ने अपने नृत्य प्रस्तुत किए। कुल्लू में सम्पन्न लोककला महोत्सव में और दो अन्य अन्तरराष्ट्रीय महोत्सवों में रूस के क्रस्नादार प्रदेश की रूसी कज़्ज़ाक नृत्यमण्डली ’स्तानित्सा’ और रूसी गायन  मण्डली ’स्लवीत्सा’ ने अपने कार्यक्रम पेश किए। मुम्बई और नई दिल्ली में विश्वप्रसिद्ध रूसी संगीतकार ईगर बुतमान और जॉज़ आर्केस्ट्रा ’मॉस्को जॉज़ बैण्ड’ ने भी बड़ी धूम मचाई। भारत स्थित रूसी दूतावास प्रसिद्ध रूसी चित्रकार परिवार -- रेरिख़ परिवार के नग्गर (कुल्लू घाटी, हिमाचलप्रदेश) और तातागिनी (कर्नाटक) में स्थित संग्रहालयों और स्मारक परिसरों के विकास में भी बड़ी सक्रियता से योग दे रहा है। इन स्मारक परिसरों को संग्रहालय का रूप दे दिया गया है और वहाँ रेरिख़ परिवार की अमूल्य सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को  सुरक्षित रखा जा रहा है। हमें आशा है कि हमारे भारतीय मित्र इन स्मारक परिसरों और वैज्ञानिक-शोध केन्द्रों को विश्व स्तर के संग्रहालयों में बदलने में हमारी सहायता करेंगे।
भारत में रूस का दूतावास अपनी प्रकाशन गतिविधियों से भी रूस और भारत के बीच सांस्कृतिक सम्पर्कों को मजबूत बनाने में बड़ा योग दे रहा है। दिसम्बर, 2014 में रूसी दूतावास ने प्रसिद्ध रूसी चित्रकार वसीली विरिशागिन के बनाए चित्रों की एक शानदार एल्बम प्रकाशित की। अँग्रेज़ी और रूसी भाषाओं में प्रकाशित इस एल्बम का नाम है -- ’वसीली विरिशागिन -- भारतीय गीतिकथा’। यह एल्बम रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन की भारत-यात्रा के अवसर पर प्रकाशित की गई थी। यह एल्बम उसी सीरीज में प्रकाशित की गई थी, जिसमें रूसी दूतावास उन रूसी विद्वानों और कलाकारों के बारे में पुस्तकें प्रकाशित करता है, जिन्होंने अपना जीवन भारत को समर्पित किया है।
इस वर्ष रूस में भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। भारतीय संगीतकार और नर्तक रूस के विभिन्न नगरों में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रसिद्ध रूसी कलाकार भी इस साल भारत में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। आगामी अक्तूबर में नई दिल्ली और मुम्बई के कलामंचों पर ईगर बुतमान के साथ रूसी जॉज़ संगीत के सितारे फिर से अपने कंसर्ट कार्यक्रम देंगे। मुगल मिनियेचर आर्ट और ’बाबरनामे’ की हस्तलिखित पाण्डुलिपि में शामिल चित्रों की प्रदर्शनी भी भारतीय दर्शकों के लिए अनूठी होगी। रूस का राजकीय पूर्वी जातीय कला संग्रहालय दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में यह प्रदर्शनी आयोजित करेगा।
जहाँ तक पर्यटन की बात है तो पिछले वर्षों में भारत की यात्रा करने वाले रूसी पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। सन 2014 में क़रीब डेढ़ लाख रूसी पर्यटकों ने भारत की यात्रा की। भारत द्वारा रूस के नागरिकों के लिए वीजा व्यवस्था को आसान बनाने के बाद भारत आने वाले रूसी पर्य़टकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब रूस के नागरिक भारत पहुँचकर भारत में ही वीजा ले सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें पहले से ही इलैक्ट्रोनिक आवेदन-पत्र जमा कराना होता है।
प्रसन्नता की बात है कि पिछले दौर में दो देशों के युवा-वर्ग के बीच भी सहयोग बढ़ता जा रहा है। पिछले एक वर्ष में सिर्फ़ नई दिल्ली में ही हमारे दो देशों के युवा वर्ग के प्रतिनिधियों की कई मुलाक़ातें हो चुकी हैं। ब्रिक्स-दल के सदस्य देशों के युवक-युवतियों के बीच भी भेंटों और मुलाक़ातों का आयोजन किया गया है। मुझे विश्वास है कि युवा वर्ग के हाथों में हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।

नताल्या बेन्यूख़ -- आप क्या सोचते हैं -- ऊफ़ा में सम्पन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन से रूस और भारत के लिए व्यापारिक-आर्थिक क्षेत्र में, बैंकिंग के क्षेत्र में और अन्य क्षेत्रों में आपसी सहयोग की कौन-कौन सी नई सम्भावाअएँ सामने आई हैं?
अलेक्सान्दर कदाकिन -- विगत जुलाई के महीने में रूस में हुए ब्रिक्स और शंसस (शंघाई सहयोग संगठन) के शिखर-सम्मेलनों ने एक बार फिर से दिखाया कि रूस और भारत के नज़रियों में बहुत ज़्यादा समानता है और ये दोनों देश फ़ौरी अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करने और बहुध्रुवीय दुनिया को मज़बूत बनाने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। भारत हमारे इस नज़रिए से पूरी तरह सहमत है कि सँयुक्त राष्ट्र संघ की सहमति के बिना एकतरफ़ा ढंग से लगाए गए आर्थिक प्रतिबन्धों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। ऊफ़ा में हुई मुलाक़ात के दौरान भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के इस नज़रिए की पुष्टि की कि इस तरह की कार्रवाइयाँ विश्व की अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँचाती हैं। इसलिए ब्रिक्स दल के देशों के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने के लिए काम करना बेहद ज़रूरी है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विश्व वित्तीय प्रणाली के पुराने हो चुके मॉडल को बदलने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया और ऐसी नई संस्थाओं का निर्माण करने की बात कही गई जो आधुनिक चुनौतियों के अनुकूल हों। नए ब्रिक्स विकास बैंक के गठन और आरक्षित मुद्राओं की सूची पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। भारत में लोगों को आशा है कि इन नई संस्थाओं की गतिविधियाँ शुरू होने के बाद ढाँचागत परियोजनाओं पर तथा सामाजिक और मानवीय कार्यक्रमों पर अमल करने के लिए ऋण लेना आसान हो जाएगा, जिसका अर्थव्यवस्था की स्थिरता पर सकारात्मक असर पड़ेगा। नरेन्द्र मोदी द्वारा सीमाकरविहीन व्यापार समझौता करने, ब्रिक्स देशों का पहला व्यापार मेला आयोजित करने, रेलमार्गों के निर्माण के क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग करने तथा कृषि क्षमता का विकास करने से जुड़े जो प्रस्ताव रखे गए, उनका ऊँचा मूल्यांकन किया गया।
भारत के राजनीतिक क्षेत्रों मे ऊफ़ा को अब इसलिए याद किया जाता है क्योंकि ऊफ़ा में ही भारत को शंसस (शंघाई सहयोग संगठन) का पूर्णाधिकार प्राप्त सदस्य बनाने के लिए कार्यवाही शुरू की गई। भारत के शंसस का सदस्य बनने से शंसस की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और अन्तरराष्ट्रीय मंच पर उसकी भूमिका और ज़्यादा मज़बूत होगी। शंसस शान्ति और सुरक्षा के हित में, आतंकवाद व नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकने के लिए तथा वैश्विक और क्षेत्रीय चुनौतियों व ख़तरों का सामना करने में सक्रिय रूप से भूमिका निभाएगा। अफ़ग़ानिस्तान की परिस्थिति को स्थिर और नियमित करने तथा आतंकवादी गिरोह ’इस्लामी राज्य’ तथा अन्य कट्टरपन्थी उग्रवादी इस्लामी गुटों के विरुद्ध संघर्ष करने की दृष्टि से शंसस की भूमिका विशेष रूप से सामयिक होगी।
ऊफ़ा शिखर सम्मेलनों के दौरान ही रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन और भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की दुपक्षीय मुलाक़ात भी हुई। इस साल के अन्त तक नरेन्द्र मोदी एक बार फिर रूस की यात्रा करेंगे। नरेन्द्र मोदी की अगली रूस-यात्रा की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। जल्दी ही दो देशों के अन्तरसरकारी आयोगों और कार्यदलों की बैठकें होंगी, जिनमें वे विषय तय किए जाएँगे, जिनपर दो देशों के नेता अपनी मुलाक़ात के दौरान चर्चा करेंगे। भावी मास्को शिखर-सम्मेलन से हमारे दो देशों के रिश्तों को नई प्रेरणा मिलेगी। इस शिखर सम्मेलन के दौरान ऐसे नए विचार सामने आएँगे जो रूसी भारतीय सहयोग को प्रोत्साहित करेंगे और समृद्ध करेंगे।
हमारे दोस्त भारत को स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ !

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