सीरिया सम्बन्धी वार्ता में कोई समझौता नहीं

Wednesday, 28 October 2015 08:41

शुक्रवार को वियना में सीरियाई संकट के समाधान से जुड़े सवालों पर विदेशमंत्री स्तर की कई मुलाक़ातें हुई। रूसी विशेषज्ञों के अनुसार, आतंकवादी संगठन आईएस यानी ’इस्लामी राज्य’ (इरा) के ख़िलाफ़ एक व्यापक गठबंधन बन सकता है लेकिन इस गठबन्धन का एक भी सदस्य किसी भी तरह का कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं हैं। विगत 23 अक्तूबर को सीरिया में रूसी सैन्य कार्रवाई की शुरुआत के बाद रूस के विदेशमंत्री सिर्गेय लवरोफ़ और अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी की वियना में पहली मुलाक़ात हुई। दोनों विदेशमन्त्रियों के बीच बन्द कमरे में आपसी बातचीत होने के बाद सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्री भी इस बातचीत में शामिल हो गए। दोनों ही वार्ताओं में चर्चा सीरियाई संकट के समाधान और आतंकवादी संगठन आईएस यानी ’इस्लामी राज्य’ (इरा) के ख़िलाफ़ एक व्यापक गठबंधन के निर्माण के बारे में ही हुई। दो घण्टे के बाद चारों विदेशमन्त्रियों ने घोषणा की कि यह वार्ता आगे जारी रखी जाएगी और उसके लिए अगली बैठक एक सप्ताह के भीतर आयोजित की जाएगी।लेकिन मन्त्रियों ने यह नहीं बताया कि सम्पन्न हुई बैठक में कौन से विचार उभरकर आए। रूस के विदेशमन्त्री ने वियना की इस मुलाक़ात पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बातचीत आसान नहीं थी और उसमें बड़ी उपयोगी चर्चा हुई। एक क़दम आगे रूस के विदेशमन्त्री सिर्गेय लवरोफ़ की टिप्पणी से यह बात साफ़ हो गई कि बातचीत में राष्ट्रपति बशर असद के पद छोड़ने के बारे में कोई सहमति नहीं हुई है और अगली बैठकों में सिर्फ़ चार देशों के ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य देशों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। रूस को आशा है कि अगली बैठक में कम से कम ईरान और मिस्र तो शामिल होंगे ही, बाद की बैठकों में कतर, सँयुक्त अरब अमीरात तथा जोर्डन व इस इलाके के अन्य प्रमुख देश भी शामिल हो सकते हैं। 23 अक्तूबर को ही सिर्गेय लवरोफ़ ने जोर्डन के विदेशमन्त्री से भी मुलाक़ात की, जिसमें यह तय किया गया कि अम्मान में सैन्य-गतिविधियों के बीच समन्वय किया जाएगा। रूस के विदेशमन्त्री ने कहा — बशर असद और समूचा सीरियाई विपक्ष (यानी सीरिया का घरेलू विपक्ष और प्रवास में रह रहे सीरियाई विपक्षी नेता भी) आपस में बातचीत करेंगे, जिसे उन देशों का भी सक्रिय समर्थन प्राप्त होगा, जो सीरिया में दिलचस्पी ले रहे हैं। इस बातचीत से बहुत से देशों को जोड़ने में जो सफलता मिली है, बहुत से रूसी विशेषज्ञों की नज़र में यह भी एक बड़ी सफलता है। रूसी रणनीतिक शोध-संस्थान के एशिया और पश्चिमी एशिया अध्ययन केन्द्र की संचालक येलेना सुपोनिना का कहना है — यह तो पहले ही मालूम था कि एक ही बैठक में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है। मतभेद इतने गहरे हैं कि इस मुलाक़ात को ही आगे की ओर बढ़ा एक क़दम माना जाना चाहिए। सभी देश वास्तव में किसी सम्भावित अन्तरराष्ट्रीय गठबन्धन के निर्माण का रास्ता खोज रहे हैं। रूस की विज्ञान अकादमी के प्राच्य अध्ययन संस्थान के अरब और इस्लाम अध्ययन केन्द्र के विशेषज्ञ बरीस दोल्गफ़ का कहना है — मुलाक़ात आगे जारी रहेगी, यह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण परिणाम है। हालाँकि फिर भी ’रूस-भारत संवाद’ से बात करते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि बातचीत की यह प्रक्रिया शायद ही और तेज़ होगी। छवि बनाए रखनी है मतभेदों का एक बड़ा कारण पहले की तरह बशर असद का सीरिया का राष्ट्रपति बने रहना है। इसलिए बेहतर तो यही होगा कि फ़िलहाल इस मुद्दे को यहीं पर छोड़कर सारा ध्यान आतंकवाद के उन्मूलन की ओर केन्द्रित किया जाए। येलेना सुपोनिना ने कहा — राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर असद की समस्या भी हल की जा सकती है। परन्तु बड़ा सवाल तो यह है कि क्या बराक ओबामा की कोई अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति है या नहीं क्योंकि अमरीका में चुनाव अभियान शुरू हो गया है। रूस के हायर स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के राजनीतिशास्त्र विभाग के विशेषज्ञ लियानीद इसाएफ़ का कहना है — तुर्की में भी अगले हफ़्ते संसद के लिए चुनाव होने जा रहे हैं, जिनमें तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एरदोगान को अपनी पार्टी को बहुमत से जिताना है। ’असद को जाना होगा’ — अगर अपनी इस माँग से वे इस समय इंकार करेंगे तो उनकी विदेशनीति असफल सिद्ध हो जाएगी और वे राजनीतिक तौर पर दिवालिया माने जाएँगे। इसाएफ़ ने कहा — मैं उस स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ, जब प्रभावशाली ढंग से सरकार चलाने वाले एरदोगान अपने मतदाताओं के सामने कमज़ोर दिखाई देंगे। सीरिया के उग्रवादी इस्लामी गिरोहों को की जा रही हथियारों की सप्लाई भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। बरीस दोल्गफ़ ने बताया एरदोगान के नेतृत्व में तुर्की में सत्तारूढ़ सरकार संयमित इस्लाम समर्थकों की सरकार है, जिसमें तुर्की स्थित ’मुस्लिम ब्रदरहुड’ से निकले इस्लाम समर्थक शामिल हैं। इनके रिश्ते सीरियाई ’मुस्लिम ब्रदरहुड’ के साथ भी हैं (जबकि रूस में ’मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है)। यही कारण है कि वे सीरियाई उग्रवादियों का समर्थन कर रहे हैं। दोल्गफ़ के अनुसार, बशर असद नहीं, बल्कि यही मुख्य समस्या है। सीरिया में स्थिति वास्तव में बदलती जा रही है। सीरियाई सेना को सफलता मिल रही है। होम्स, हामा और अलेप्पो सूबों को आतंकवादियों से मुक्त करा लिया गया है, इसलिए इस समय बशार असद के पदत्याग की बात करना एक बेवकूफ़ी ही है। ’रूस-भारत संवाद’ से बात करते हुए विशेषज्ञों ने कहा — फ़िलहाल बुनियादी सवाल तो अपनी छवि को बनाए रखने का है। पिछले साढ़े चार साल से चला आ रहा सीरियाई संकट मास्को के लिए भी और वाशिंगटन के लिए भी अब गम्भीर प्रतिष्ठा का सवाल हो गया है। अब तो इस संकट का समाधान करने के लिए वह तरीका खोजना होगा, जिसमें सभी की छवि सुरक्षित बनी रहे। लियानीद इसाएफ़ ने कहा — लेकिन स्थिति को पूरी तरह से समझते हुए भी कोई भी समझौता करना नहीं चाहता है।

 

http://hindi.rbth.com, 28.10.2015

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