दुनिया में युद्ध और शान्ति का सवाल आज मुख्य सवाल है - पूतिन

Wednesday, 28 October 2015 08:46

रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन ने कहा कि आज जिस सवाल को लेकर सबसे ज़्यादा चिन्ता हो रही है — वह सवाल युद्ध और शान्ति का सवाल है। रूस के सोची नगर में आयोजित वल्दाई विचार कल्ब की बैठक में बोलते हुए गुरुवार को रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन ने कहा कि आज जिस सवाल को लेकर सबसे ज़्यादा चिन्ता हो रही है — वह सवाल युद्ध और शान्ति का सवाल है। अपने महान् उपन्यास में महान् रूसी लेखक लेव तलस्तोय ने युद्ध को मानव के ख़िलाफ़ बताया था। जापान में एटम बम के इस्तेमाल के बाद दुनिया को यह समझ में आ गया कि वैश्विक संघर्ष में कोई विजेता नहीं हो सकता है। विशाल स्तर पर युद्ध या महायुद्ध अब निरर्थक हो गया है। अगर इस तरह की कोई लड़ाई अब दुनिया में होगी तो उस लड़ाई का मतलब होगा कि मानवजाति का ही अन्त हो जाएगा। व्लदीमिर पूतिन ने कहा — हर देश के अपने हित होते हैं और ये हित कभी-कभी एक-दूसरे से बहुत अलग होते हैं। यह एक सामान्य बात है। लेकिन ज़रूरी यह है कि जिन रास्तों पर चलकर ये हित प्राप्त किए जाते हैं, वे रास्ते अन्तरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप होने चाहिए। कुछ देशों को यह आदत पड़ गई है कि वे अपनी भू राजनीतिक इच्छाएँ दूसरे देशों पर थोपते हैं। मेरी नज़र में यह एक बड़ा ख़तरनाक रवैया है। यह ख़तरा उनके लिए भी है, जो इस तरह के काम करते हैं। मेरा मतलब अमरीका से है। दो विश्व-युद्धों के बाद दुनिया में जो युद्ध प्रतिरोधी क्षमता पैदा हो गई थी, अब वह कमज़ोर पड़ चुकी है। अब दर्शकों के लिए स्क्रीन पर दिखाई देने वाला युद्ध सिर्फ़ एक चित्र होता है। व्लदीमिर पूतिन ने कहा — दुनिया की आर्थिक स्थिति अब ऐसी हो गई है कि कोई एक देश अब उसे नियन्त्रित नहीं कर सकता है। वे सोचते हैं कि उन्हें यह अधिकार है कि वे दूसरे देशों पर प्रतिबन्ध लगा सकते हैं, उन पर ज़ुर्माने कर सकते हैं। हम हर तरह से इसका विरोध करने की कोशिश करते हैं। इसके लिए हम चीन की रेशमी मार्ग की पहल का सक्रिय रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं। हम ब्रिक्स और अपेक संगठनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब संस्कृतियों और धर्मों को आपस में टकराने के लिए ’लड़ाई’ शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है। ज़रा देखिए, यूरोप पहुँचने वाले शरणार्थियों की क्या हालत हो रही है। इस टकराव भरे जनप्रतिरोध से राष्ट्रवाद की लहर भी पैदा हो सकती है। व्लदीमिर पूतिन ने कहा — सेना का इस्तेमाल दुनिया की राजनीति में मुख्य उपकरण बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा। लेकिन यह मुख्य बात समझनी ज़रूरी है कि हर तरह की स्थिति में सेना का इस्तेमाल करना सम्भव नहीं है। जब सेना के इस्तेमाल से समस्याएँ सुलझती नहीं, बल्कि और ज़्यादा उलझती हैं, जैसाकि पश्चिमी एशिया में हो रहा है तो फिर सेना का इस्तेमाल करने का क्या फ़ायदा। उचित तो यह होगा कि हम अपनी सेनाओं का इस्तेमाल अपने एक ही दुश्मन — आतंकवाद के विरुद्ध करें। व्लदीमिर पूतिन ने पूछा — ’इस्लामी राज्य’ कैसे इतने बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर पाया? सोचिए ज़रा। अगर ’इस्लामी राज्य’ दमिश्क पर कब्ज़ा कर लेगा तो क्या यह गिरोह एक संस्था नहीं बन जाएगा? आतंकवादियों के गिरोह का आकार बढ़ता चला जा रहा था। सीरियाई विद्रोहियों के लिए जो हथियार भेजे जा रहे हैं, वे हथियार हर हालत में आतंकवादियों तक पहुँच जाते हैं। सीरियाई सरकार का औपचारिक अनुरोध प्राप्त करने के बाद हमने वहाँ अपनी वायुसेना को भेजने का निर्णय किया। मैं एक बार फिर इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि हम सीरिया में वैध रूप से काम कर रहे हैं। इस इलाके में स्थिरता पैदा करने के लिए, हमारी नज़र में, सबसे पहले इस इलाके को आतंकवादियों से मुक्त कराना ज़रूरी है। इससे सीरिया की सभी देशभक्त राजनीतिक ताक़तों को एकजुट करने में मदद मिलेगी। व्लदीमिर पूतिन ने कहा — वहाँ स्थिति को सामान्य बनाने की प्रक्रिया में हमें मुस्लिम धर्मगुरुओं और मुल्लाओं को आकर्षित करना चाहिए। जनता के बीच उनकी बड़ी नैतिक प्रतिष्ठा होती है। हमें आशा है कि वे उग्रवादी प्रचार से इस्लाम को अलग करने में सहायता करेंगे। हमें अभी से सीरिया के आर्थिक पुनरुद्धार का ’रोड मैप’ अभी से बनाना चाहिए। हमें अभी से यह सोचना चाहिए कि वहाँ स्कूल और अस्पताल फिर से काम करने लगें। सीरिया को भारी मानवीय सहायता की ज़रूरत होगी। हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम किस स्तर पर आपस में सहयोग कर सकते हैं। व्लदीमिर पूतिन ने अन्त में कहा — हम देख रहे हैं कि विभिन्न देशों के रक्षा मन्त्रालयों के बीच धीरे-धीरे सहयोग शुरू हो चुका है। रूस और अमरीका के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान पर हुई सहमति की इसमें बड़ी भूमिका है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम एक-दूसरे को अपना सहयोगी समझें। बीते दौर में हमने जो ग़लतियाँ की हैं, उन्हें समझना चाहिए और आगे वैसी ही ग़लतियाँ नहीं करनी चाहिए। इससे हमें सही चुनाव करने की सम्भावना मिलेगी। यह चुनाव सहयोग के पक्ष में होगा। यह चुनाव शान्ति के पक्ष में होगा।

 

http://hindi.rbth, 23.10.2015

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