रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन का भारतीय मीडिया के साथ साक्षात्कार

Wednesday, 10 December 2014 23:23

रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन का भारतीय मीडिया के साथ साक्षात्कार

प्रश्न 1. प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत कीआपकी आगामी यात्रा प्रथमहै, लेकिनइससे पहलेअंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के अंतर्गत आप दोनों की मुलाकात हो चुकी है। रूस और भारत के बीच राजनीतिक, आर्थिक और व्यापार संबंधों की दृष्टि से इस शिखर सम्मेलन को लेकर आप किन-किन परिणामों की उम्मीद करते हैं?

उत्तर:रूस के राष्ट्रपति के रूप में मैं भारत की यात्रा 5 बार कर चुका हूँ| मुझे अक्तूबर 2000 की यात्रा विशेष रूप सेयाद है जब हमनेभारत के साथ रणनीतिक साझेदारीके ऐतिहासिक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे|

जहाँ तक भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने संपर्कों की बात है, तो वास्तव में हमारा परिचयइस वर्ष जुलाई में ब्राज़ील में आयोजित ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन के मौके पर हुआ था| नवंबर महीने में ब्रिस्बेन में "बीसके समूह" के शिखर सम्मलेन के अवसर पर भी ब्रिक्स के सदस्य देशों के राज्यप्रमुख और शासनाध्यक्षों की बैठक में हमें एक सार्थक संवाद करने का अवसर मिला|

मैं संतोष के साथ कह सकता हूँ कि भारतीय सरकार सहयोग के नए प्रत्याशित क्षेत्रों को खोजने के लिए तत्पर है| मुझे पूरा विश्वास है किआने वाले रूसी-भारतीय शिखर सम्मेलन में द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने कीहमारी इच्छा महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त करने में सहायक होगी|

हम रूस और भारत के बीच विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारीको और मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने के बारे में चर्चा की अपेक्षा करते हैं। व्यापार और आर्थिक संबंधों तथा आपसी निवेश का विस्तार करने की ओरविशेष रूप से ध्यान दिया जाएगा| गत 5 नवंबर को नई दिल्ली में हुई व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग पर अंतरसरकारी आयोग की बैठक मेंतथा व्यापार व निवेश पर रूसी-भारतीय फोरम के दौरान गंभीर प्रारंभिक कार्य किया जा चुका है। भारतीय परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए नए ऊर्जा ब्लॉकों का निर्माण, भारतीय बाज़ार में रूसी विमान "सुखोई सुपरजेट 100" और एमएस -21 परियोजनाओं को आगे बढ़ाना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में ग्लोनास प्रणाली का कार्यान्वयन करना भी संयुक्त रणनीतिक परियोजनाओं की सूची में सम्मिलित है|हमारी प्राथमिकताओं में ब्यूटिल रबड़के उत्पादन के लिए एक संयंत्र का निर्माण, हेलीकाप्टरों का निर्माण, रूसी प्रौद्योगिकीकी सहायता से एक 'स्मार्ट सिटी' बनाने और औद्योगिक ट्रैक्टरों की असेंबली का काम भी शामिल हैं|

सैन्य-तकनीकी सहयोग का विकास हमारेरणनीतिकसहयोग के मुख्य घटकों में से एक है,जिसे हम विशेष महत्व देते हैं। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में पूरी की जाने वाली परियोजनाओं पर हम खूब चर्चा करेंगे जिन में पक्के उपकरण की आपूर्ति तथा तकनीकी-औद्योगिकी क्षेत्र मेंघनिष्टसहयोग से संबंधित प्रश्न भी शामिल हैं।

इसके अलावा, दोनों अत्यावश्यक अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय विषयों पर तथा यूरेशिया और दुनिया भर में सुरक्षा वस्थिरता को मज़बूत करने के लिए विदेश नीति समन्वय को आगे बढ़ाने के मुद्दों पर भी हम विचार-विमर्श करेंगे।

बेशक, हमारे दोनों देशों के नागरिकों के बीच संपर्कों को आगे बढ़ाने और मानवीय क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के बारे में हम विस्तार से बात करेंगे।

प्रश्न 2. पारंपरिक रूप से भारत रूस और उससे पहले सोवियत संघ को एक विश्वसनीय और सार्वकालिक मित्र मानता है|हालांकि पिछले कुछ समय से रूस और पाकिस्तान के बीच सैन्य-तकनीकी क्षेत्र में बढ़ता सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है। आपके विचारों में क्या, रूसी-भारतीय सैन्य-तकनीकी सहयोग में परिवर्तन होने की सम्भावना है या नहीं?

उत्तर:हमारे दोनों देशों के बीच सैन्य-तकनीकी सहयोग कई दशकों से चल रहा है| मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि भारत एक विश्वसनीयभागीदार है जो समय के परीक्षण पर खरा उतरा है|

यदि हम किसी परिवर्तन के बारे में बात करें, तो यह बिल्कुल दूसरे प्रकार का परिवर्तन होगा| जैसे कि मैंने पहले से ही बता चुका हूँ, उच्चस्तरीयद्विपक्षीय सहयोग और विश्वास की बदौलत "निर्माता उपभोक्ता" के पारंपरिक मॉडल से हटकर हम उन्नत हथियार प्रणालियों के संयुक्त निर्माण और उत्पादन के लिए एक क्रमिक परिवर्तन शुरू कर सकते हैं| ऐसे प्रभावी सहयोग के उदाहरण पहले से मौजूद हैं। मेरा मतलब है आधुनिक परिशुद्धता वाली मिसाइलों "ब्रह्मोस" का उत्पादन और बहुउद्देशीय पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने का काम|

पाकिस्तान के साथ हमने आतंकवाद का मुकाबला करने और नशीले पदार्थों के फैलाव के विरुद्ध कार्यवाही में सुधार करने के लिए रूस की संभव सहायता के बारे में बातचीत की है। हमारे विचार में इस तरह के सहयोग में भारत सहित क्षेत्र के सभी देशों का दीर्घकालिक हित है।

प्रश्न 3. रूस और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में एक दूसरे के साथ मिलकर सफलतापूर्वक काम कररहे हैं। भारत पूर्वी साइबेरिया में तेल और गैस क्षेत्रों के विकास में भाग लेकर इस सहयोग का विस्तार करना चाहता है। इस मुद्दे में रूस का रवैया क्या है? भारत वास्तव में इस सहयोग को लेकर क्या अपेक्षा कर सकता है? आपकी राय में,भारत के लिए एक पाइपलाइन के माध्यम से रूसी प्राकृतिक गैस को उपलब्ध कराने की क्या संभावनाएँ हैं?

उत्तर: ऐतिहासिकदृष्टि से रूसी हाइड्रोकार्बन का निर्यात मुख्यतः पश्चिम देशों में होता रहा है। हालांकि, यूरोप में तेल व गैस की खपत धीरे-धीरे से बढ़ रही है जबकि राजनीतिक, विनियामक और पारगमन जोखिम बढ़ते जा रहे हैं। यह सब एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के तेज़ी से चल रहे विकास की पृष्ठभूमि में हो रहा है। इसलिए, यह स्वाभाविक हैकि हम ऊर्जा आपूर्ति के विविधीकरण में रुचि रखते हैं|

हमें एशियाई बाज़ारों के लिए एक विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्तिकर्ता की भूमिका को ज़्यादा मज़बूत बनाने की उम्मीद है। और साथ ही हम रूस के पूर्वी साइबेरियाई और सुदूर पूर्वी क्षेत्रों में नए बुनियादी ढांचे तैयार करके आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के भी इच्छुक हैं।

वर्तमान रूसी ऊर्जा परियोजनाओं के पैमाने को देखते हुए, हम भारत सहित दूसरे देशों से नए निवेश और प्रौद्योगिकी को आकर्षित करने में रुचि रखते हैं। "सखालिन -1" परियोजना भारतीय कंपनियों के साथ परस्पर सहयोग का एक विशेष अच्छा उदाहरण है|इस में स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन ओएनजीसी अपनी सहायक कंपनी "ओएनजीसी विदेश लिमिटेड" (ओवीएल) के माध्यम से भाग ले रही है| ओवीएल रूस में भारत की सबसे बड़ी निवेशक कम्पनी है। "सखालिन -1" परियोजना के अंतर्गत भारत में एक मिलियनटन प्रतिवर्ष से अधिक तेल का निर्यात किया जाता है।

आज आर्कटिक में हाइड्रोकार्बन के विकास में ओवीएल की भागीदारी के प्रश्न पर सक्रिय रूप से विचार किया जा रहा है। इस वर्ष के मई महीने में सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक फ़ोरम के दौरान"रोसनेफ्त"कंपनी नेइस के साथ एक अंतर्राष्ट्रीय सहायता संघ के ढांचे में रूस के आर्कटिक शेल्फ पर सहयोग के बारे में एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे| आर्कटिक परियोजनाओं को अमल में लाने के लिए "गैसप्रोम नेफ्त" कंपनी भी भारतीय तेल और गैस कंपनियों के साथ सहयोग स्थापित करने की इच्छुक है।

जहाँ तक भारत को रूस से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति का सवाल है, इस मुद्दे पर ध्यान से विचार किया जाना चाहिए। प्रारंभिक जाँचसे पता चलता है कितरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति की कीमत की तुलना में एक पाइपलाइन द्वारा परिवहन की कीमत काफी अधिक हो सकती है| मतलब यह है कि मोटे तौर पर यह वाणिज्यिक वांछनीयता की बात है।

अब तक रूसी तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन सबसे अधिक आशाजनक है। स्मरणीय है कि "गैसप्रोम विपणन और व्यापार" कंपनी पिछले साल दो भागों में कुल 1.1लाख टन एलएनजी भारत भेज चुकी है| इस वर्ष जून में "गैसप्रोम" समूह और भारतीय कंपनी “गैस अथोरिटी आफ़ इंडिया लिमिटेड" के बीच एलएनजी की आपूर्ति के लिए 2012 में हस्ताक्षरित एक दीर्घकालीन अनुबंध प्रभावी हो गया है, जिसके अनुसार भारत को बीस साल के लिए 25 लाख टन की वार्षिक मात्रा में गैस निर्यात की जायेगी| गैस का पहला बैच 2017 में भारत को मिलने की आशा है, और यदि इस की आपूर्ति में कोई विलम्ब भी होगा तो वह ज़्यादा से ज़्यादा 2021तक रहेगा|

हमउम्मीद करते हैं किऊर्जा के क्षेत्र में हमारे सहयोग को आगे बढ़ाना भारत कास्थिर और सतत सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए सक्षम होगा तथा भारतीय नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता पर इसका सकारात्मकप्रभावपड़ेगा|

प्रश्न 4. शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में रूस भारत का एकपुराना साथी है। निकट भविष्य में कौनसे समझौते अमल में लाने की सम्भावना है? क्या, इस सम्बन्ध में कोई समस्याएँ सामने आ सकती हैं?

उत्तर:परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग हमारी रणनीतिकसाझेदारी का एक स्तम्भ है। हमनेइस क्षेत्र में 2008 और 2010 में दो अंतरसरकारी समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं| 2010 में भारत में रूसी परियोजना के अनुसार परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण पर जिस रोडमैप पर हस्ताक्षर किए गएइसको अमली रूप दिया जा रहा है|

कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की दो इकाइयों पर काम नियमित कार्यक्रम के अनुसार चल रहा है। अक्टूबर 2013 में परमाणु ऊर्जा संयंत्र की पहली इकाई ने पूरी क्षमता से काम शुरू कर दिया था और इस साल के जून में इसे भारत के ग्रिड से जोड़ दिया गया था। दूसरी इकाई का काम शुरू करने की तैयारी पूरी हो चुकी है|

दूसरे स्टेशन का निर्माण शुरू करने के लिए प्रलेखन को अंतिम रूप दिया जा रहा है|मुंबई में इस साल के अप्रैल में तीसरी और चौथीइकाइयों के निर्माण पर एक सामान्य रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि आज एनपीपी "कुडनकुलम" दुनिया में एकमात्र ऐसा परमाणु ऊर्जा संयंत्र है जो फुकुसिमा दुर्घटना के पश्चात् सुरक्षा के लिए नामांकित की गई सभी शर्तों पर पूरा उतरता है|

कुडनकुलम में नए परमाणु रिएक्टरों के निर्माण के अलावा रूसी डिज़ाइन के एक नए परमाणु बिजली स्टेशन के निर्माण के लिए भारत सरकार द्वारा साइट के आवंटन की प्रतीक्षा है।

हमारे पास भारत में 25 इकाइयों के निर्माण करने की क्षमता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह संख्या भी तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा नहीं कर पायेगी| इसलिए हम भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के साथ आगामी बैठक में परमाणु उद्योग में हमारे सहयोग के आगे के विकास के लिए संभावनाओं पर चर्चा करना चाहते हैं। एक बुनियादी दस्तावेज़ "परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग में रूसी-भारतीय सहयोग मज़बूत बनानेपर रणनीतिकधारणा"पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयारीकी जा रही है| इस दस्तावेज़ में नई इकाइयों के निर्माण के साथ-साथ वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी और नवीन गतिविधियों के आदान-प्रदान के लिए भी प्रावधान हैं|

प्रश्न 5. रूस और भारत द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। हमारे देशों के बीच मुक्त व्यापार व्यवस्था स्थापित करने की संभावनाओं के बारे में आपक्या कह सकते हैं?

उत्तर:रूस और भारत के बीच द्विपक्षीय आर्थिक और व्यापारिक सहयोग के लिए विशाल क्षमता है। हालांकि दुनिया में व्यापक प्रतिकूल आर्थिक स्थिति की वजह से पिछले कुछ समय से द्विपक्षीय व्यापार में हम गिरावट देख रहे हैं। पिछले साल कारोबार की राशि 10 अरब डॉलर थी जो इस से पहले की अवधि की तुलना में एक अरब डालर कम है। इस प्रवृत्ति को उल्टा करने की आवश्यकता है।

परमाणु ऊर्जा, सैन्य-तकनीकी सहयोग, अंतरिक्ष अनुसंधान, विमानन और मोटर वाहन निर्माण, दवाइयाँ, रसायन उद्योग, सूचना और नैनोटेक्नॉलजीजैसे उच्च तकनीकी क्षेत्रों के विकास पर विशेष ज़ोर दिया जाना चाहिए।

नवम्बर में हुई अंतरसरकारी आयोग की बैठक में स्थापित काम की नई दिशाओं को लेकर हम बहुत-सी अपेक्षाएँ करते हैं| इस बैठक के अंतर्गत रणनीतिक सहयोग पर संयुक्त कार्य दल की स्थापना हुई तथाप्राथमिक निवेश परियोजनाओंकी और ध्यान दिया गया है|

भारत ने रूस, बेलारूस और कज़ाकिस्तान के सीमाशुल्क संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने में रुचि व्यक्त की है। यूरेशियन आर्थिक आयोग के द्वारा विशेषज्ञों के एक संयुक्त समूह का गठन किया गया है जो यह निर्धारित करेगा कि कौनसे कदम उठाये जाने चाहियें, माल के किन समूहों के लिए बाज़ार खुल सकती है, और किन चीज़ों के लिए यह अभी असामयिक होगा|

बेशक, व्यापार की शर्तों पर ही सब कुछनिर्भर नहीं करता है। अनेक दिशाओं में सुधार करने की आवश्यकता है, जैसे किवित्तीय लेन-देन के कार्यान्वयन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँपैदा करना| राष्ट्रीय मुद्राओं में हिसाब चुकाने की संभावना भी अत्याधिक प्रासंगिक विषय है|

प्रश्न 6. इस वर्ष के मई महीने में भारत में सरकार परिवर्तन के फलस्वरूप क्या, रूसी-भारतीय संबंधों में विशेषाधिकारप्राप्त रणनीतिक साझेदारीके विकास पर कुछ असर पड़ा है?

उत्तर:रूस और भारत के बीच संबंध कभी भी अटकलों के शिकार नहीं हुए हैं। ऐतिहासिक युगोंके परिवर्तन, राजनीतिक और राजकीय नेताओं के आने-जाने के बावजूदहमारे देश बहुमुखी द्विपक्षीय सहयोग को और मज़बूत बनाने मेंएक दूसरे के विश्वसनीय भागीदार रहे हैं|

उदाहरण के लिए, रणनीतिक साझेदारीके जिसऐतिहासिक घोषणापत्र का पहले हीउल्लेख हो चुका है, हम ने उस पर चौदह साल पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हस्ताक्षर किए थे, जो भारतीय जनता पार्टी की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। हमारे संबंधों को विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर लाने मेंभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पिछली सरकार का बहुत ही बड़ा योगदान रहा है|

मैं आश्वस्त हूँ कि नई सरकार के साथ हम उपयोगी और पारस्परिक रूप से लाभप्रद बहुतल संपर्कों को जारी रखेंगे| विशेष रूप से इसलिए भी कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में श्री नरेंद्र मोदी ने कई बार अस्त्राखान क्षेत्र का दौरा किया है और इस क्षेत्र व भारतीय प्रान्तके बीच भाईचारे के संबंधों की स्थापना की है| और आज हम खुश हैं कि हमारे मित्रदेश भारत का नेतृत्व एक जाने माने राजनैतिक के हाथों में है जिन्होंने रूसी-भारतीय सहयोग को मज़बूत बनाने के लिए पहले ही एक महान योगदान दिया है|

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