महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध में फासिस्टवाद पर विजय की सत्तरवीं जयंती के अवसर पर चित्र प्रदर्शनी के उदघाटन में भारत में रूसी राजदूत महामहिम अ.म.कादाकिन का भाषण

Sunday, 03 May 2015 19:55

नग्गर, 2 मई 2015
आदरणीय़ अतिथियो,
प्रिय मित्रो!
    एक और बार हम सब लोग आशीर्वादित हिमालय के इस पवित्र स्थान में जमा हो गये हैं। पर इस साल का महत्व विशेष है। इस साल हम दो महान वर्षगाँठ मनाते हैं।

    सब लोग जो विश्वशाँति का मूल्यवान समझते हैं एक हफ़ते बाद एक विशिष्ट उत्सव मनाऐंगे। यह अभिमान व शोक का दिन है। यह उच्चतम सम्मान व चिरस्मति का दिन है। यह महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध में सोवियेत संघ के लोगों का विजय दिवस है। मेरे देश के सुपुत्रों और पुत्रियों की कई पीढियों के लिये यह उत्सव सब से प्रमुख और पावन है। वह भिन्न-भिन्न राष्ट्रों, धर्मों तथा व्यवसायों के लोगों को एकजुत करता है।

    एक और महत्वपूर्ण तिथि है जो इन दिनों सारी दुनिया में मनाई जाती है, वह रोरिक पक्ट का वर्षगाँठ है। अस्सी साल पहले निकोलस रोरिक का सब से मानवतावादी परियोजना प्रकाशित हुई – कलात्मक व वैज्ञानिक संस्थाओं तथा ऐतिहासिक स्मारकों पर संरक्षण पर संधि। इस के साथ-साथ मानवजाति ने अपने सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक विरासत पर प्रतिरक्षा का प्रतीक पा चुका – शांति का झंडा।

    यह प्रतीकात्मक है कि संधि पर इसी समय में हस्ताक्षर किया गया था जब हिटलर का फ़ासिस्टवाद यूरोप के दिल में अभी अपना विकृत सिर उठाने लगा। लगता है कि चित्रकार को निकट ख़तरा का पूर्वज्ञान आया। निकोलस रोरिक तथा उसकी पत्नी ऐलेना और उनके पुत्र यूरी व स्वेतोस्लाव अथकरूपसेइस दस्तावेज़ परकामकर रहे थे।वेस्पष्ट रूप सेइस भयानकविपत्तिसमझतेथेजिसकीपरछाईसारीदुनिया परगिरपडी।

रोरिक पक्ट के वर्षगाँठ के अवसर परभारत में रूसी दूतावासरोरिकअंतरराष्ट्रीयकेंद्रसहित यहाँ पर निकोलस रोरिकके  चित्रोंका संग्रह गर्व से प्रस्तुत कर रहे हैं।इसमेंभलाईकीदुष्टतापरविजयचित्रितहै।हमने उसे  “पवित्र वसंत विजयका” कानामदे दियाक्योंकियहरोरिकसंधिकेसारांशकीप्रतिमाहै। यह तोशांतिएवंसांस्कृतिक विरासतबचानेके लिये हमारेप्रसिद्धस्वदेशवासीकीपुकार है।

हम ने रोरिककेचित्रोंकीप्रदर्शनीमहान विजय दिवसकीदेहलीपरआयोजित की गई है क्योंकि इसी तरह हम एक बार फिरसोवियत लोगोंकेवीरतापूर्ण कर्मको श्रद्धांजलि अर्पितकरना चाहते हैं।सोवियत लोगोंनेनाजीआक्रमणकारियोंकेहरानेमेंऔरद्वितीय विश्वयुद्धके विजयपूर्णअंतमेंमुख्यभूमिका निभाई।हमारेसेवानिवृत्त सैनिकों को हमसम्मानकरतेहैं।सभी लोगों कोसम्मान करते हैं जिन्होंनेअपनी मातृभूमिकीस्वतंत्रता की रक्षा करने के लिएतथादुनियाको नाजीधमकीऔरअत्याचारसेबचानेके लिएअपनी जानें दे दीं।मेरे समदेशियों में से 2.7 करोड़लोगइसयुद्धमें मर गये।हमको इसयुद्ध के सबक  कभी नहीं भूलजानाहै।इसलियेपूर्णतःअस्वीकार्यहैजबकुछलापरवाहपश्चिमीराजनीतिज्ञनाज़ीवादकोबढ़ावादेकरअंतर-जातीय संघर्षऔरसैन्य धमकियोंकोउत्तेजित करतेहैं।
आजकलअनियंत्रित अतिवाद, आतंकवादी हमलोंव स्थानीय संघर्षों की वजह से सांस्कृतिक मूल्यों के ऊपर खतरा मंडराया है।जोगतिविधियाँ फ़िलहाल यूक्रेन में हो रही हैं हम इन से बहुत चिंतित हैं।हमेंयूक्रेनी फौज की ओर सेभारी गोलाबारी  के कारणस्लाविअन्स्क, लुगान्स्क, डोन्बासके दूसरेनगरों मेंऑर्थडाक्स चर्च के विनाशकेअनेक समाचारमिले। निश्चय ही, हम इसलिए भी बेहद दुःख महसूस कर रहे हैं कि यूक्रैन के गोर्लवका में स्थित कला संग्रहालय के हाल का हमें अता-पता नहीं हैं क्योंकि इस इलाके में क्रूर आपसी लड़ाई जारी है। इस संग्रहालय में निकोलस रोरिकद्वारा रचाए गए अट्ठाईस चित्र रखे हुए हैं जिनको अत्यंत बहुमूल्य माना जाता है। क्या, कला सागर की इनमोतियों को सुरक्षित रखने में सफलता मिली या नहीं – यह तो कहना बहुत मुश्किल लगता है।

यह देखकर कि भारत में रोरिक परिवार की सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक विरासत को इतना महत्व दिया जाता है, हम बहुत खुश हैं। कुल्लू घाटी में स्थित रोरिक परिवार के जागीर को देखने हेतु रूस तथा भारत को लेकर दुनिया के बहुत सारे देशों से लाख से ज़्यादा चित्रकला के शौकीन पर्यटक हर साल आते हैं। अभी हमारा मान करता है कि हम साथ साथ यूनेस्को से अपील करें ताकि रोरिक परिवार के जागीर तथा इनके धार्मिक विरासत की रक्षा को ज़्यादा से ज़्यादा महत्व दिया जाए।

हम केंद्रीय सरकार को रोरिक मेमोरियल ट्रस्ट यानी रोरिक स्मारक ट्रस्ट की गतिविधियों में मान लगाकर ज़्यादा सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहन देना चाहेंगे। हम सब मिलकर नग्गर में स्थित रोरिक जागीर को वैश्विक संग्रहालय के स्तर तक बढ़ा सकते हैं। इस क्षेत्र में रूस और भारत के बीच सहयोग को अंतर सरकारी समझना चाहिए ताकि रूसी-भारतीय सांस्कृतिक सहयोग के अंतर्गत दिल्ली में स्थित रूसी राजदूतावास तथा मास्को में स्थित भारतीय राजदूतावास इस काम में लग जाए। इस क्षेत्र में अत्यंत सामूहिक संभावनाएँ मौजूद हैं जिनके लिए भारत के विदेश मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय तथा आइसीसीअर यानी भारतीय सांस्कृतिक सहयोग परिषद की मदद अत्यंत ज़रूरी है। हम हिमाचल प्रदेश की सरकार विशेषकर हमारे देश के पुराने दोस्त महामहिम मुख्य मंत्री ड. वीरभाद्र सिंघ के साथ सहयोग भी आगे बढ़ने की उम्मीद रखते हैं।

हम अंतर्राष्ट्रीय रोरिक स्मारक ट्रस्ट की रक्षा व सफलता हेतु रूसी-भारतीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए हर कोशिश करते रहेंगे। सही कहना होगा कि संस्कृति में रोरिक परिवार के अमूल्य योगदान से दुनिया को मेल में लाया जाता है।

जय रूस जय हिंद!

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