IT WAS EXACTLY ON THIS DAY - AUGUST 9, 1971 - 44 YEARS AGO

Sunday, 09 August 2015 11:22

IT WAS EXACTLY ON THIS DAY - AUGUST 9, 1971 - 44 YEARS AGO THAT FOR THE FIRST TIME IN MY LIFE I STEPPED ON THE INDIAN SOIL AS THE PROBATIONER OF THE EMBASSY. THAT EVENT OUTLINED THE COURSE OF MY ENTIRE LIFE A.M.KADAKIN

मास्को-दिल्ली संधि जिसने दक्षिण एशिया का नक्शा बदल डाला

भारत-रूस के संबंधों के इतिहास में 9 अगस्त 1971 का दिन एक ऐसा दिन था जिसने न केवल दो देशों के रिश्तों के स्वरूप को दशकों तक निर्धारित किया बल्कि तत्कालीन विश्व के समीकरण में आमूल परिवर्तन ला कर कालांतर में दक्षिण एशिया के मानचित्र को बदल डाला|
यह वह काल था जब अमेरिका एक तरफ से अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी सोवियत संघ के खिलाफ उसके माओवादी पड़ौसी चीन के साथ इश्कबाज़ी कर रहा था दूसरी और भारत के खिलाफ अमेरिका, पाकिस्तान और चीन का गठबंधन मजबूत होता जा रहा था| उल्लेखनीय है कि उस समय का पाकिस्तान अमेरिका की अगुआई में CENTO और SEATO सैन्य गुटों का सदस्य था और चीन के साथ उसकी दोस्ती गहराती जा रही थी, जिससे तीन दिशाओं से घिरे भारत की सुरक्षा को गंभीर ख़तरा पैदा हो गया था| 
 इसी पृष्ठभूमि में सोवियत विदेश मंत्री अंद्रेई ग्रोमिको 1971 के अगस्त के शुरू में नई दिल्ली पहुंचे और 9 अगस्त को उन्होंने तथा भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह के साथ सोवियत-भारत शांति, मैत्री और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किये| इस संधि की धारा 9 ने भारत को उसकी सुरक्षा का पूरा आश्वासन दिलाया जिसमें इस बात का प्रावधान था, किसी भी पक्ष की सुरक्षा को खतरा पैदा होने की हालत में भारत और रूस दोनों मिल कर इस खतरे को दूर करने के संयुक्त प्रयास करेंगे|
 हालांकि भारत और विश्व में अनेक मंडलों ने इसे भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति के खिलाफ माना, परंतु कुछ महीनों बाद 1971 के दिसंबर में बांग्लादेश मुक्ति अभियान की सफलता के बाद, कम से कम देश में इस संधि के विरोधियों के मुहं बंद हो गए|
 तब एक तरफ से भारी मात्रा में सोवियत अस्त्रों की मदद से भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने पूर्वी पाकिस्तान में तैनात पाकिस्तानी सैन्य तंत्र की रीढ़ तोड़ी, तो दूसरी ओर मास्को द्वारा भेजी गयी परमाणु पनडुब्बियों ने अमेरिकी सातवें बेड़े के विमानवाहक ‘एन्टरप्राइज़’ को पाकिस्तानी सेना की मदद के लिए बंगाल की खाड़ी में नहीं घुसने दिया, तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत विरोधी प्रस्ताव पास ने होने देने के लिए क्रेमलिन के आदेश पर रूसी प्रतिनिधिमंडल के नेता याकोव मलिक ने नौ दिनों में तीन बार ‘वीटो’ का प्रयोग किया|
 अगर क्षेत्रीय नज़रिए से देखा जाए तो भारत के पूर्व में एक स्वाधीन राष्ट्र बांग्लादेश की उत्पति सोवियत-भारतीय शांति, मैत्री और सहयोग की संधि की सबसे बड़ी उपलब्धि है, जिसने न केवल दक्षिण एशिया के नक़्शे को बदल डाला बल्कि भारत की सुरक्षा को भी पुख्ता किया|
 मास्को की इसी नीति के अंतर्गत भारत को उस काल के सर्वोत्तम रूसी मिग-27 और मिग-29 लड़ाकू विमान, ‘किलो’ क्लास की पनडुब्बियां, कई श्रेणियों के युद्धपोत और भारी टैंक व अन्य अस्त्र प्राप्त हुए| यही वह दोस्ती थी जिसने भारत में कई प्रकार के आधुनिक अस्त्रों के उत्पादन और विकास की नीवं डाली|
 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद उसके उत्तराधिकारी रूसी फेडरेशन ने जनवरी 1993 में भारत के साथ नयी मैत्री और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किये| शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद जब दुनिया दो शिविरों बंटी थी, अब बिलकुल नयी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति पैदा हो रही थी, इसको ध्यान में रखते हुए नयी संधि में धारा 9 जैसा कोई प्रावधान नहीं था, फिर भी रूस और भारत ने एक दूसरे के खिलाफ गुटों में भाग न लेने की वचनबद्धता ली और एक-दूसरे की सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिये सहयोग को बढाने का वायदा किया|
 नये हालात में भी 1971 की मैत्री संधि द्वारा डाली गयी नींव मजबूत होती गयी और अक्तूबर 2000 में नये रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन की भारत यात्रा के दौरान उसके आधार पर सामरिक साझेदारी के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये गए| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में यह अपने प्रकार का पहला दस्तावेज़ था| कालांतर में बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के विकास के साथ-साथ यह साझेदारी ‘विशिष्ट’ साझेदारी में बदल कर विश्व में सुरक्षा और स्थिरता का कारक बनती जा रही है |

 

 

 

 

 

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