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दिल्ली में टी.एन. कौल स्मृति समारोह

Saturday, 23 November 2013 19:27

भारत में रूसी दूतावास और भारतीय विदेश मंत्रालय की पहल पर 21 नवंबर को दिल्ली में स्थित रूस के विज्ञान एवं संस्कृति केन्द्र में प्रसिद्ध भारतीय राजनयिक और राजनेता, रूसी-भारतीय मैत्री सभा के एक संस्थापक, स्वर्गीय श्री त्रिलोकी नाथ कौल (1913-2000) की 100-वीं जन्मतिथि को समर्पित एक स्मृति समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह के मुख्य अतिथि भारत के विदेशमंत्री श्री सलमान खुर्शीद थे।

रूस के विज्ञान एवं संस्कृति केन्द्र के बड़े हॉल में आयोजित इस समारोह में प्रसिद्ध भारतीय राजनयिकों, विदेश मंत्रालय के अधिकारियों, प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों, कारोबारी हलकों, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक अभिजात वर्ग के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इन लोगों में सी.आई.एस. देशों के राजदूत, रूसी संस्थाओं के कर्मी और उनके कई रूसी हमवतन भी शामिल थे। टी.एन. कौल की याद में आयोजित इस समारोह की पूर्ववेला में एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया था। इस प्रदर्शनी में श्री टी.एन. कौल द्वारा लिखित कई पुस्तकें और 60 अभिलेखीय तस्वीरें प्रदर्शनार्थ रखी गई हैं। श्री टी.एन. कौल सन् 1962 से सन् 1966 तक और फिर सन् 1986 से लेकर सन् 1989 तक, यानी दो बार मास्को में भारत के राजदूत रहे थे। इसके अलावा वह प्रथम उप-विदेशमंत्री तथा अन्य महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर भी सेवा करते रहे थे।

इस स्मृति समारोह में एकत्रित भागीदारों के नाम रूस के विदेश मंत्री सेर्गेय लवरोव ने अपना एक संदेश भेजा। इस संदेश में कहा गया है कि विदेश नीति के क्षेत्र में श्री त्रिलोकी नाथ कौल की सेवाएं उल्लेखनीय हैं। उन्होंने एक ऐसी विदेश नीति की नींव रखने में योगदान किया था जिसके परिणाम आज सबके सामने हैं। आधुनिक भारत- दुनिया का एक शक्तिशाली देश है और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उसकी प्रतिष्ठा बहुत ऊँची है।

दिल्ली में आयोजित टी.एन. कौल स्मृति समारोह के भागीदारों को संबोधित करते हुए भारत के विदेशमंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने कहा- "पिछले एक दशक में पूरी दुनिया में आए कई परिवर्तनों के बावजूद भारत और रूस के बीच संबंध पहले की भांति ही उनके लिए सैद्धांतिक रूप से आज भी बहुत महत्वपूर्ण बने हुए हैं। हमने भी बदलना और समय के साथ-साथ चलना सीख लिया है। कुछ लोगों का कहना है कि अब रूस के साथ हमारे संबंध उतने घनिष्ठ नहीं रहे हैं जितने घनिष्ठ ये संबंध सोवियत संघ के साथ हुआ करते थे। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जो लोग ऐसी बातें करते हैं वे बिलकुल ग़लत हैं। वे नहीं जानते हैं कि आजकल हमारे संबंध कितने गहरे, घनिष्ठ, विशेष और शाश्वत हैं।"

भारत में रूस के राजदूत अलेक्सांदर कदाकिन के अनुसार, त्रिलोकी नाथ कौल रूसी-भारतीय सहयोग के इतिहास में घटी युगांतरकारी घटनाओं के एक प्रत्यक्षदर्शी और निर्माता थे, निर्भीक और रचनात्मक विचारों, अपरंपरागत तथा काफी महत्त्वपूर्ण फैसलों की पहलकदमी करनेवाले व्यक्ति थे। इन फैसलों की बदौलत अगली कई पीढ़ियों तक हमारे संबंध लगातार विकास कर रहे हैं। टी.एन.कौल को इस बात में गहरी आस्था थी कि भारत और रूस को हमेशा एक साथ रहना चाहिए। उनका अपना जीवन और कार्य-गतिविधियां भी इसी ध्येय को समर्पित थीं। अलेक्सांदर कदाकिन ने कहा- "मेरे देश में टी.एन.कौल को आज भी बड़े स्नेह से याद किया जाता है और रूस तथा भारत के बीच आपसी सूझ-समझ, मैत्री और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत बनाने के लिए उनके योगदान का ऊँचा मूल्यांकन किया जाता है। रूस के राजदूत ने कहा कि आज की यह संध्या भी, जिसका आयोजन भारत के विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर किया गया है, इस विलक्षण व्यक्ति और रूस के एक सच्चे दोस्त को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि है। उन्हें रूस में हमेशा याद रखा जाएगा।"

अफ़गानिस्तान के लिए भारतीय प्रधानमंत्री के विशेष दूत, श्री एस.के. लाम्बा, राष्ट्रमंडल के महासचिव कमलेश शर्मा, राजदूत अशोक सज्जनहार, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्ध सांस्कृतिक हस्ती, कपिला वात्स्यायन ने भी रूसी-भारतीय दोस्ती और सहयोग को मज़बूत बनाने के लिए टी.एन.कौल के महान योगदान का विशेष रूप से उल्लेख किया। टी.एन. कौल स्मृति संध्या में मास्को के लिए नियुक्त भारत के नए राजदूत तथा भारत के उप-विदेशमंत्री श्री पी. एस. राघवन और रूस की एक प्रसिद्ध प्राच्यविद, ततियाना शाऊम्यान भी इस समारोह में उपस्थित थे।

श्री टी.एन.कौल के बेटे और बेटी प्रदीप और प्रीति ने भी स्मृति समारोह को संबोधित किया और अपने पिता को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनमें रूस के लिए प्रेम की भावनाएँ उनके पिता ने ही भरी थीं। मास्को राजकीय विश्वविद्दालय की स्नातक, प्रीति कौल-सहगल ने रूसी भाषा में बोलते हुए कहा- "मेरे प्रिय रूसी मित्रो, मुझे यहाँ, मेरे देश में रूसी भूमि के इस द्वीप पर आपके बीच बैठकर बहुत खुशी महसूस हो रही है। आधी सदी पहले मैं अपने भाई के साथ मिलकर पहली बार रूस गई थी। जैसे जैसे मैं रूसी आत्मा की विशालता और रूसी भाषा की भावनात्मक सूक्ष्मता को पहचानती गई, मुझे रूस के साथ प्यार होता गया। मैं रूसी कविता, साहित्य और संस्कृति की खूबसूरती को पहचानती चली गई और आज मैं अकेली ऐसी नहीं हूँ। मेरे कई करीबी दोस्त भी रूस से इसी तरह प्यार करते हैं। यह सच्चा और बेगरज़ प्यार है। इसका मेरे पेशे, किसी लाभ या राजनीति से कोई संबंध नहीं है। हमारे दो देशों के लोगों के बीच गहरी आध्यात्मिक रिश्तेदारी है। भगवान करे, ऐसी रिश्तेदारी सदा बनी रहे!"

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